Saturday, January 3, 2026

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बांग्लादेश: खोकन दास की मौत से उपजे गंभीर सवाल, कट्टरपंथियों ने जिंदा जलाकर मार डाला

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3 जनवरी 2026, 09:47 am IST
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बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला शरियतपुर जिले का है, जहाँ एक हिंदू दुकानदार खोकन दास ने बर्बर हमले के दो दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया। 50 वर्षीय खोकन दास अपने गांव में एक मेडिकल स्टोर और मोबाइल बैंकिंग का छोटा व्यवसाय चलाते थे। उन पर 31 दिसंबर की रात को एक हिंसक भीड़ ने उस वक्त हमला किया जब वे अपनी दुकान बंद कर घर लौट रहे थे। गंभीर रूप से झुलसे और जख्मी खोकन दास को ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।


घटना का विवरण दिल दहला देने वाला है। जानकारी के अनुसार, हमलावरों ने पहले खोकन दास को रास्ते में घेरकर उनके पेट और सिर पर घातक वार किए। इसके बाद क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उन पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई। अपनी जान बचाने के लिए वह पास के एक तालाब में कूद गए, जिससे आग तो बुझ गई, लेकिन तब तक उनका शरीर बुरी तरह झुलस चुका था। हमलावर मौके से फरार होने में सफल रहे। यह घटना पिछले दो हफ्तों में किसी हिंदू नागरिक पर हुआ चौथा बड़ा हमला है, जो देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।


खोकन दास की पत्नी ने इस घटना पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने बताया कि उनके पति एक बेहद साधारण व्यक्ति थे और उनकी किसी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इतनी बेरहमी से उनकी हत्या क्यों की गई। परिवार अब प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है। यह मामला अकेला नहीं है; इससे पहले दिसंबर माह में ही अमृत मंडल और दीपु चंद्र दास जैसे युवाओं को भी भीड़ ने अपनी हिंसा का शिकार बनाया था। दीपु चंद्र दास के मामले में तो ईशनिंदा के झूठे आरोप लगाकर उन्हें कारखाने के भीतर ही मार दिया गया और फिर शव को पेड़ से लटकाकर आग लगा दी गई थी।


इन लगातार होती घटनाओं पर सरकार का रुख संदेहास्पद रहा है। अंतरिम सरकार ने कुछ मामलों की निंदा तो की है, लेकिन अक्सर इन हमलों को सांप्रदायिक हिंसा मानने से इनकार कर दिया जाता है। सरकारी बयानों में अक्सर इन घटनाओं को व्यक्तिगत रंजिश, आपराधिक गतिविधि या जबरन वसूली से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और पीड़ित परिवारों ने सरकार की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका मानना है कि अल्पसंख्यकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है और अपराधियों को उचित दंड न मिलने के कारण ऐसी घटनाओं का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

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