अयोध्या। कहते हैं कि अपराध की नीयत रखने वाले इंसानों के हौसले चाहे जितने बुलंद हों, लेकिन भगवान के घर में देर है, अंधेर नहीं। वो रामलला, जिनकी एक झलक पाने के लिए देश-दुनिया से करोड़ों भक्त अपनी गाढ़ी कमाई का अंश उनके चरणों में न्यौछावर कर देते हैं... उन्हीं रामलला के दरबार से एक ऐसी खबर आई है जिसने हर सनातनी के दिल को झकझोर कर रख दिया है। आस्था के सबसे बड़े केंद्र में, धर्म की नगरी अयोध्या में, मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी गईं। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिन हाथों को करोड़ों के चढ़ावे की पवित्र गिनती का जिम्मा मिला था, वही हाथ रामलला के खजाने पर डाका डाल रहे होंगे। जी हां, अयोध्या के राम मंदिर में एक ऐसा महाघोटाला सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों से लेकर सरकार तक के होश उड़ा दिए हैं।
तो आज की इस खास रिपोर्ट में हम बात करेंगे अयोध्या के राम मंदिर में की चढ़ोत्तरी वाली रकम चोरी की...
सबसे पहले आपको बताते हैं कि कैसे यह मामला सामने आया
इस खुलासे की शुरुआत जून माह की शुरुआत में राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा किए गए ऑडिट के दौरान दानपात्र से नकदी और अन्य वस्तुओं के गायब होने की आशंका से हुई। आशंका होने पर जब मंदिर परिसर और दानपात्र के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की गई तो फुटेज में एक कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध दिखाई दी। इसी आधार पर आंतरिक जांच शुरू की गई, लेकिन उस वक्त मामले को गोपनीय रखा गया। मामला सुर्खियों में तब आया जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 7 जून को योगी सरकार पर हमला बोला और उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अयोध्या में मंदिर के चढ़ावे को लेकर कुछ बातें रखीं। इसके बाद आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने भी इसी मुद्दे पर बयान देकर योगी सरकार पर निशाना साधा, जिससे यह मामला पूरे देश की नजरों में आ गया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले पर कितने गंभीर हैं
तो जब मामला तूल पकड़ने लगा, तब 13 जून को CM योगी के आदेश पर मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई। जांच अधिकारियों ने बताया कि यह कदम श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर उठाया गया है। इस एसआईटी टीम में लखनऊ के डिविज़नल कमिश्नर आईएएस विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक आईपीएस किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल हैं।
अब तक हुई गिरफ्तारी और संदेही
एसआईटी ने पहले दिन यानि की 13 जून को मंदिर के 2 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया था, जिसमें से एक नाम लवकुश मिश्रा का था जिसके घर से करीब 10 लाख रुपये नकद बरामद किए गए हैं। बताया जा रहा है कि कुछ रकम घर की आलमारी में रखी गई थी, जबकि कुछ नकदी गोबर के ढेर में दबाकर छिपाई गई थी। बरामद राशि के स्रोत को लेकर फिलहाल जांच जारी है और अधिकारियों ने इस संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया है। इसके अलावा एक और कर्मचारी को संदेह के आधार पर हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की जानकारी सामने आई है। दोनों कर्मचारियों की जिम्मेदारी मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गिनती और उससे जुड़े कार्यों की थी। बताया जा रहा है कि दोनों कर्मचारियों को प्रतिमाह लगभग 18 से 20 हजार रुपये वेतन मिलता था, लेकिन हाल के महीनों में उनकी संपत्तियों में असामान्य वृद्धि की चर्चा जांच एजेंसियों के रडार पर है। जानकारी के मुताबिक एक कर्मचारी ने लगभग डेढ़ करोड़ रुपये मूल्य की भूमि खरीदी, जबकि दूसरे ने करीब 40 लाख रुपये का प्लॉट लिया है। इसके अलावा और भी कई नाम एसआईटी को मिले हैं, जिनकी जांच जारी है।
चोरी कैसे हो रही थी और इसका खुलासा कैसे हुआ
दरअसल, रामलला मंदिर के गर्भगृह और दर्शन पथ के पास रखे दानपात्रों से जो भी नकदी निकाली जाती है, उसे परिसर के भीतर ही बने एक गोपनीय कक्ष में ले जाया जाता है। सुरक्षा कारणों से इस कमरे की सटीक लोकेशन को बेहद गुप्त रखा जाता है और किसी भी बाहरी व्यक्ति का यहां घुसना पूरी तरह वर्जित है। इस कमरे के भीतर नोटों की गिनती के लिए 50 कर्मचारियों की एक बड़ी टीम तैनात थी। इनमें 24 कर्मचारी प्राइवेट एजेंसी के थे, जिनका काम नोट गिनकर बंडल बनाना था। इन पर नजर रखने के लिए ट्रस्ट के 12 कर्मचारी तैनात थे, यानी एक निगरानीकर्ता के जिम्मे दो कर्मचारी थे। इसके अलावा, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और टीसीएस की ऑडिट टीमों के 14 एक्सपर्ट्स भी वहां मौजूद रहते थे। लेकिन, 14,500 रुपए के मामूली वेतन पर काम करने वाले इन कर्मचारियों की नजरें जब दान के करोड़ों रुपयों पर पड़ीं, तो उनकी नीयत डोल गई। वो चुपके से नोट पार करने लगे। इस चोरी की भनक तब लगी जब वेतन पर गुजारा करने वाले दूसरे कर्मचारियों ने अपने ही साथियों की बदलती लाइफस्टाइल को भांप लिया। मंदिर प्रशासन में जब उनकी बात नहीं सुनी गई, तो एक कर्मचारी ने इस राज को अयोध्या की गलियों में आम कर दिया, जो देखते ही देखते देश की सबसे बड़ी सुर्खी बन गया।
वे नाम, जो इस जांच के दायरे में हैं
एसआईटी की जांच के दायरे में आया पहला बड़ा नाम हैं रामशंकर उर्फ टिन्नू यादव, जो श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के सहयोगी बताए जाते हैं। एक वक्त था जब टिन्नू यादव अयोध्या की सड़कों पर ऑटो चलाया करते थे और एक पुरानी मोटरसाइकिल से चलते थे। लेकिन पिछले 5 सालों में उनकी किस्मत ऐसी पलटी कि आज अयोध्या और लखनऊ में उनके पास करीब 50 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति है। अयोध्या एयरपोर्ट के पास टिन्नू का 70 कमरों का एक बड़ा हॉस्टल है, शहर के तीन बड़े रेस्टोरेंट्स में उनकी पार्टनरशिप है, और लखनऊ में एक आलीशान मकान के साथ फॉर्च्यूनर कार खड़ी है। टिन्नू ने अपने इसी रसूख के दम पर अपने भतीजे मनीष यादव को भी नोटों की गिनती के काम में लगवा दिया था। एक और नाम है केडी तिवारी, जिनके कंधों पर श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए सोने-चांदी के कीमती आभूषणों को संभालने और उनकी रसीद देने की जिम्मेदारी थी, वो भी अब संदेह के घेरे में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने पिछले कुछ सालों में करीब 5 करोड़ रुपए की संपत्ति जुटाई और 1.5 करोड़ की जमीन खरीदी। हालांकि, केडी तिवारी खुद को बेकसूर बताते हैं। उनका कहना है कि उनके बेटे भारतीय वायुसेना, आईबी (IB) और यूपी पुलिस जैसे सम्मानीय विभागों में रहे हैं और यह संपत्ति उनके बेटों की गाढ़ी कमाई की है। इसी तरह, नोटों की गिनती करने वाली टीम के एक और सदस्य राजेश पाठक की पिछले 5-6 सालों में अचानक बदली आलीशान जीवनशैली ने भी जांच एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए लवकुश मिश्रा का साला अनुकल्प मिश्रा भी इसी नोट गिनने वाली टीम का हिस्सा था, जिसके परिवार ने हाल ही में अयोध्या के एक पॉश इलाके में करीब 65 लाख रुपए का एक आलीशान घर खरीदा और अपने पैतृक गांव में एक बड़ा फार्म हाउस खड़ा कर दिया। अभी हाल ही में उन्होंने गांव के इस फार्म हाउस पर श्रीमद्भागवत कथा का बड़ा आयोजन कराया, जहां पानी की तरह पैसा बहाया गया और शादी-समारोहों में महंगे उपहार और साड़ियां बांटकर अपने वैभव का खुलेआम प्रदर्शन किया गया। जांच टीम को इस पर भी गहरा संदेह है। इसके अलावा और भी कई नाम है, लेकिन अभी आधिकारिक तौर पर इन नामों को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
तो फिलहाल इस महाघोटाले ने राम भक्तों को अंदर तक झकझोर दिया है, लेकिन इस हाई-प्रोफाइल जांच को लेकर अयोध्या के संतों में एक अजीब सी मायूसी और अविश्वास भी है। संतों का मानना था कि इस संवेदनशील मामले की जांच किसी रिटायर्ड जज की निगरानी में होनी चाहिए थी, न कि प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में। वहीं दूसरी तरफ, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने यह कहकर इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लिया है कि उनका सरोकार सिर्फ निर्माण कार्य से है, ट्रस्ट के अंदर क्या चल रहा है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। बहरहाल, अब पूरे देश की नजरें SIT की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं जो 15 दिनों के भीतर सामने आने वाली है। तभी साफ हो पाएगा कि रामलला के खजाने पर डाका डालने वाले असली मगरमच्छ कौन हैं और आस्था के नाम पर हुआ यह खेल कितना बड़ा है।

