सुप्रीम कोर्ट समेत देश भर की अदालतों में पेंडिंग 5.41 करोड़ मामले बने चुनौती

‘दुर्भाग्यपूर्ण है… हमें समय बर्बाद करना पड़ रहा है’, आवारा कुत्तों के मामले में बोला सुप्रीम कोर्ट
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देश में जुडिशरी के सामने अभी भी सबसे बड़ी चुनौती करोड़ों की पेंडेंसी को लेकर है। देश भर की निचली अदालतों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल मिलाकर भारी पेंडेंसी है। 28 दिसंबर 2025 के आंकड़ों के मुताबिक देश भर की निचली अदालतों, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल मिलाकर 5 करोड़ 41 लाख केस पेंडिंग हैं। देशभर की निचली अदालतों में 4.76 करोड़ केस पेंडिंग है। इनमें 3.65 करोड़ मामले क्रिमिनल हैं और बाकी सिविल मैटर के हैं।
निचली अदालतों में यूपी में कुल 1.13 करोड़ मामले पेंडिंग है। वहीं दिल्ली की निचली अदालतों में 15.85 लाख मामले पेंडिंग हैं। तो सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक अभी 91,892 मामले पेंडिंग है। राज्यों के हाईकोर्ट में 63.67 लाख मामले पेंडिंग हैं। इन पेंडेंसी में 19.01 लाख मामले क्रिमिनल है जबकि 44.65 लाख मामले सिविल मैटर हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने नवंबर में शपथ से ठीक पहले कहा था कि उनकी प्राथमिकता होगी कि पेंडेंसी पर काबू पाया जाएं। उन्होंने कहा था, हम सबसे पहले यह देखेंगे कि कैसे कम किया जाए और इसके लिए जो संसाधन है उसका इस्तेमाल बेहतर तरीके से किया जाएगा।
बता दें पिछले साल 11 जुलाई को लॉ मिनिस्ट्री ने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों को दिशा निर्देश जारी किए थे ताकि वैसे मामले जहां सरकार पक्षकार है उनका जल्द निपटारा सुनिश्चित हो सके। विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा जारी एक कार्यालय ज्ञापन में कहा गया है कि यह एसओपी अनावश्यक मुकदमों को रोकने और आपसी विभागीय समन्वय को बेहतर बनाने में मदद करेगी। रिटायर डिस्ट्रिक्ट जज और कानूनी जानकार बताती है कि भारत में न्यायिक मामलों का लंबित बोझा अब केवल आंकड़ों की समस्या नहीं रहा है, बल्कि यह एक संवैधानिक संकट का रूप ले चुका है, जो न्याय तक सार्थक पहुंच को प्रभावित करता है। इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट की जोनल बैच की स्थापना पर विचार किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की परिकल्पना मुख्यतः एक संवैधानिक न्यायालय और अतिम व्याख्या की अदालत के रूप में की गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के सामने पेंडिंग मामलों का एक बड़ा हिस्सा विशेष अनुमति याचिकाओं का है, जो सेवा मामलों, जमीन विवादों और सामान्य दीवानी और आपराधिक अपीलों से संबंधित है, जिन्हें हाईकोर्ट स्तर पर ही अंतिम रूप ले लेना चाहिए। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में चार स्थायी जोनल बेच की स्थापना और नई दिल्ली में स्थायी रूप से बैठने वाली एक संविधान पीठ के साथ, न्याय तक पहुंच का विकेंद्रीकरण करेगी, वादकारियों के सामने आने वाली भौगोलिक और आर्थिक बाधाओं को काफी हद तक कम करेगी। वहीं देश भर की अदालतों में जो पेंडेंसी है उसे कम करने के लिए जजों की वैकेंसी भरी जाए साथ ही इविंग कोर्ट को प्रोमोट किया जाए। समरी ट्रायल हो और टाइमबाउंड ट्रायल पूरा किया जाना तय किया जाए।
