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मध्य प्रदेशछतरपुरInternational Khajuraho Film Festival: शीतल सांझ में नृत्य की स्पंदित अनुभूति, गुरु एवं घरानों की परम्परा हुई साकार

International Khajuraho Film Festival: शीतल सांझ में नृत्य की स्पंदित अनुभूति, गुरु एवं घरानों की परम्परा हुई साकार

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22 फ़रवरी 2026, 07:08 am IST
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खजुराहो। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग तथा उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ संगीत एवं कला अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो नृत्य समारोह के 52वें संस्करण का दूसरा दिवस भाव, गति और लय के अद्भुत समन्वय का साक्षी बना। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र नागपुर, मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन छतरपुर के सहयोग से आयोजित इस समारोह में कंदरिया महादेव मंदिर और जगदम्बा माता मंदिर के मध्य सुसज्जित भव्य मंच पर शास्त्रीय और लोक नृत्यों की सजीव छटा बिखरी।


मंदिरों की दिव्य आभा और कलाकारों की सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्तियों ने दर्शकों को अलौकिक अनुभूति से भर दिया। कलाकारों का स्वागत पूर्व आईएएस अधिकारी श्री मनोज श्रीवास्तव, कलेक्टर छतरपुर श्री पार्थ जायसवाल, अकादमी निदेशक श्री प्रकाश सिंह ठाकुर तथा उपनिदेशक श्री शेखर करहाड़कर ने पुष्पगुच्छ भेंट कर किया।


कथक - जयपुर घराने की सशक्त प्रस्तुति
दूसरे दिवस की शुरुआत उत्तर भारत की प्रतिष्ठित शास्त्रीय नृत्य शैली कथक से हुई। युवा नर्तक श्री विश्वदीप (दिल्ली) ने एकल प्रस्तुति में जयपुर घराने की परम्पराओं को जीवंत किया। शिव की राजस्थानी स्तुति से आरंभ हुई प्रस्तुति में तीनताल की लयकारी, भावप्रधान बंदिश और द्रुत लय की सांगीतिक प्रस्तुति ने लोक-रस और शास्त्रीय सौंदर्य का सुंदर सामंजस्य रचा।


पुरुलिया छाऊ- अभिमन्यु युद्ध प्रसंग का मार्मिक चित्रण
इसके बाद झारखण्ड के श्री प्रभात कुमार महतो एवं साथियों ने पुरुलिया छाऊ नृत्य प्रस्तुत किया। रंग-बिरंगे वेशभूषा, मुखौटों और ढोल-नगाड़ा, शहनाई की धुनों पर सजी यह प्रस्तुति महाभारत के अभिमन्यु युद्ध प्रसंग पर आधारित रही। चक्रव्यूह भेदन से लेकर नियमविरुद्ध वध तक के दृश्य अत्यंत प्रभावशाली और भावनात्मक ढंग से मंचित किए गए, जिसने दर्शकों को गहराई से स्पर्श किया।


भरतनाट्यम- विदेशी नृत्यांगना का भारतीय परम्पराओं को नमन
दूसरे दिवस की अंतिम प्रस्तुति कजाकिस्तान की सुश्री अक्मारल काइनाजरोवा की भरतनाट्यम रही। उन्होंने 1993 से 1998 तक चेन्नई स्थित कलाक्षेत्र इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स से प्रशिक्षण प्राप्त किया है। अलारिपु से आरंभ कर राग मालिका (मिश्रचापु), कालिदास रचित ‘कुमारसंभवम्’ पर आधारित श्रृंगार रस, पारम्परिक तिल्लाना और मंगलम के साथ प्रस्तुति का समापन हुआ। उनकी प्रस्तुति में भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण और गुरु-परम्परा के प्रति आदर स्पष्ट झलका।


समग्र रूप से, समारोह का दूसरा दिवस भारतीय शास्त्रीय एवं लोक नृत्य परम्पराओं की गरिमा, आध्यात्मिकता और कलात्मक उत्कृष्टता का स्मरणीय उत्सव बनकर उपस्थित हुआ।

Today In JP Cinema, Chhatarpur (M.P.)