दतिया। मध्य प्रदेश की सबसे चर्चित और सियासी रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाने वाली दतिया विधानसभा सीट का घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। उपचुनाव की धूल अभी ठीक से थमी भी नहीं थी कि अब यह सियासी जंग सड़क और बूथ से निकलकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की चौखट तक पहुंच गई है। दतिया उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। आरोप लगाया गया है कि उन्होंने चुनाव आयोग को दिए शपथ पत्र में करीब 35 साल पुरानी एक एफआईआर की जानकारी छिपाई है। अदालत में याचिका दाखिल होते ही अंचल के सियासी गलियारों में एक बार फिर भूचाल आ गया है।


भाजपा नेता दीपक बेलपत्री ने अधिवक्ता शिवम गौतम के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर की है। याचिका के अनुसार, मामला मई 1991 का है जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शहादत के बाद दतिया में व्यापक विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम हुआ था। उस दौर में पुलिस ने 22 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था। याचिकाकर्ता की दलील है कि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक प्रत्याशी को अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का ब्योरा देना अनिवार्य होता है, लेकिन घनश्याम सिंह ने अपने हलफनामे में इस पुराने मुकदमे का कोई उल्लेख नहीं किया।


इधर, मामले के तूल पकड़ते ही विधायक घनश्याम सिंह ने पूरे घटनाक्रम को विरोधियों की सोची-समझी साजिश करार दिया है। उन्होंने दो-टूक कहा कि उन्हें 1991 के किसी भी ऐसे लंबित मुकदमे की जानकारी तक नहीं है। उस समय पुलिस ने केवल सांकेतिक प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया था और बाद में छोड़ दिया था। घनश्याम सिंह ने खुलकर आरोप लगाते हुए कहा कि याचिका दायर करने वाले लोग उनके राजनीतिक विरोधियों के इशारे पर काम कर रहे हैं। उन्होंने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती और हालिया उपचुनाव में पराजित भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी का नाम लेते हुए कहा कि जनता के फैसले को पचा न पाने वाले लोग अब इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 35 वर्षों में उन्हें इस मामले को लेकर पुलिस या अदालत से कभी कोई नोटिस या समन नहीं मिला, लिहाजा तथ्य छिपाने का सवाल ही नहीं उठता।


दतिया की सियासी तासीर हमेशा से बेहद रोचक रही है। राजेंद्र भारती की विधायकी जाने के बाद 30 जुलाई को हुए उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 मतों के अंतर से पटखनी दी थी। इस परिणाम ने भाजपा खेमे में भारी हलचल मचा दी थी और संगठन स्तर पर भी बड़े बदलाव हुए थे। अब जीत के कुछ ही हफ्तों बाद 1991 के मामले को ढाल बनाकर घनश्याम सिंह की विधायकी पर सवाल खड़े किए गए हैं। हालांकि, मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और गेंद हाई कोर्ट के पाले में है। अब अदालत की सुनवाई ही तय करेगी कि 35 साल पुराने इस 'जिन्न' से कांग्रेस की विधायकी पर कोई आंच आएगी या फिर यह सियासी तीर बेअसर साबित होगा।