भोपाल, पंकज यादव। भारत, जो अब तक अपनी गाड़ियों को दौड़ाने के लिए हर साल अरबों डॉलर का कच्चा तेल विदेशों से खरीदता था, आज ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दहलीज पर खड़ा है। प्रदूषण के धुएं से घुटती सांसों को अब भारत में एक ऐसी संजीवनी मिलने जा रही है, जो सीधे हमारे देश के खेतों से निकलेगी। दरअसल केंद्र सरकार ने एक ऐसा ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला लिया है, जो देश के ट्रांसपोर्ट सेक्टर का पूरा भूगोल बदल कर रख देगा। एक ऐसा ईंधन, जो पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से आम जनता की जेब को राहत देगा और पर्यावरण को भी पूरी तरह स्वच्छ रखेगा। हम बात कर रहे हैं इथेनॉल ईंधन की, जो कि भारत में ग्रीन एनर्जी के नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।
इस खास रिपोर्ट में हम बात करेंगे इथेनॉल के फायदे, इसके नुकसान, सरकार की मंशा और इससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर
सबसे पहले बात करते हैं 100 फीसदी शुद्ध इथेनॉल को मंजूरी पर
दरअसल भारत को ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति दिलाने की मंशा से केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। सरकार ने देश में 100 फीसदी शुद्ध इथेनॉल यानी ई-100 को बतौर वाहन ईंधन इस्तेमाल करने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने नागपुर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस बड़े फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस नीति से जुड़े सभी आवश्यक नियमों और रेगुलेशंस को अंतिम रूप देने वाली फाइल पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भारत की विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना और ट्रांसपोर्ट सेक्टर से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को रोकना है।
कितने समय में 100% इथेनॉल कारें बाजार में दस्तक देंगी
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के सहयोग की सराहना करते हुए बताया कि देश के बड़े वाहन निर्माता इस ऐतिहासिक बदलाव को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। टोयोटा, सुजुकी, एमजी और हुंडई जैसी दिग्गज कार निर्माता कंपनियां अगले 6 हफ्तों के भीतर भारतीय बाजार में अपने ऐसे नए मॉडल्स लॉन्च करने जा रही हैं, जो पूरी तरह यानी 100% इथेनॉल ईंधन पर चलेंगे। यह ईंधन पेट्रोल के मुकाबले काफी किफायती होगा, जिससे आम जनता को महंगे पेट्रोल से बड़ी राहत मिलेगी और साथ ही देश का अरबों डॉलर का ईंधन आयात बिल भी कम होगा।
क्या है इथेनॉल और कैसे होता है इसका उत्पादन?
अब यह समझना जरूरी है कि आखिर इथेनॉल क्या है और यह बनता कैसे है। तो इथेनॉल मूल रूप से एक प्रकार का अल्कोहल है, जिसे स्टार्च और शुगर के फर्मेंटेशन से तैयार किया जाता है। वर्तमान में इसे तकनीक के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी फर्स्ट जनरेशन (1G) इथेनॉल की है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने का रस, मीठा चुकंदर, सड़े आलू, मीठा ज्वार और मक्का जैसे खाद्य पदार्थों से तैयार किया जाता है। इसके बाद सेकेंड जनरेशन (2G) इथेनॉल की श्रेणी आती है, जिसके निर्माण में चावल व गेहूं की भूसी, भुट्टा, बांस और वुडी बायोमास जैसे कृषि अवशेषों का उपयोग होता है। वहीं, थर्ड जनरेशन (3G) इथेनॉल उत्पादन की सबसे आधुनिक तकनीक है, जिसके तहत इसे एलगी यानी शैवाल से तैयार किया जाएगा, जिस पर अभी वैज्ञानिकों का अनुसंधान जारी है।
अब बात करते हैं इस बदलाव की राह में खड़ी चुनौतियों की
तो इस बड़े क्रांतिकारी कदम के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां और नुकसान भी जुड़े हुए हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता यानी एनर्जी डेंसिटी पेट्रोल से लगभग 34% कम होती है, जिससे गाड़ियों के माइलेज में लगभग 3 से 6% तक की गिरावट आ सकती है। इसके अलावा, इथेनॉल में संक्षारक यानी कोरोसिव गुण होते हैं, जो लंबे समय में पुरानी गाड़ियों के प्लास्टिक और रबर के पुर्जों जैसे फ्यूल लाइन, गैस्केट और सील को गला या कमजोर कर सकते हैं। एक और बड़ी समस्या इसका नमी सोखना है; हवा से नमी सोखने के कारण लंबे समय तक गाड़ी खड़ी रहने पर पानी और इथेनॉल पेट्रोल से अलग होकर टैंक के नीचे बैठ जाते हैं, जिससे ईंधन दूषित हो जाता है और धातु के फ्यूल टैंक में जंग लगने व फ्यूल पंप में रुकावट का खतरा भी बढ़ जाता है।
पुरानी गाड़ियों पर वारंटी का खतरा
इथेनॉल ब्लेंडिंग के बढ़ने से देश की पुरानी गाड़ियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने वाला है। BS3 और BS4 मानकों वाली पुरानी गाड़ियां, जिनका इंजन इथेनॉल के लिए ट्यून नहीं है, वे इससे पूरी तरह खराब हो सकती हैं, और कई वाहन निर्माता कंपनियां इस ईंधन से होने वाले नुकसान को वारंटी में भी कवर नहीं करती हैं। इसके अलावा, बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन के लिए खाद्य फसलों के बढ़ते उपयोग से खाद्य कीमतों को लेकर भी चिंताएं उठ रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि भूमि और जल संसाधनों पर इससे अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऑटो कंपनियों को भी लगातार ऐसे इंजनों को विकसित करने के लिए भारी निवेश करना पड़ रहा है जो ज्यादा इथेनॉल के साथ बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
कुल मिलाकर देखा जाए तो इथेनॉल के जहां देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले बड़े फायदे हैं, वहीं तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। आने वाले वर्षों में इस ऐतिहासिक नीति की सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारी सरकार कृषि, ऊर्जा और ऑटो सेक्टर के बीच किस तरह का संतुलन बनाती है। क्या भारत बिना किसी बड़े नुकसान के पूरी तरह ग्रीन एनर्जी के इस सफर को तय कर पाएगा, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तो तय है कि इस फैसले ने देश को एक नए और साफ-सुथरे कल की राह जरूर दिखा दी है।

