भोपाल। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित ओबीसी आरक्षण विवाद में देश की सर्वोच्च अदालत से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने कानूनी गलियारों और अभ्यर्थियों के बीच हलचल पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले महीने के आदेश में बड़ा संशोधन करते हुए 54 याचिकाओं के भाग्य का फैसला बदल दिया है। इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया का सार उस 'रिकॉल' आदेश में छिपा है, जिसके तहत अब दो सबसे महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के बजाय स्वयं सुप्रीम कोर्ट करेगा। यह मोड़ इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए 87:13 के फॉर्मूले की वैधता को चुनौती दी गई है।
19 फरवरी के आदेश में बड़ा बदलाव और 52 याचिकाओं की 'घर वापसी'
सुप्रीम कोर्ट ने पहले 19 फरवरी 2026 को एक आदेश पारित कर ओबीसी आरक्षण से जुड़ी सभी 54 याचिकाओं को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर) ट्रांसफर कर दिया था। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मुख्य न्यायमूर्ति एक विशेष बेंच गठित कर 3 महीने के भीतर इनका निपटारा करें। लेकिन, 'ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन' द्वारा दायर रिव्यू याचिका (MA/529/26) पर 20 मार्च को खुली अदालत में सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने रुख में बदलाव किया। संशोधित आदेश के मुताबिक, अब 52 प्रकरण ही हाईकोर्ट वापस भेजे गए हैं, जबकि दो अति-संवेदनशील मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास 'रिकॉल' यानी वापस बुला लिया है।
'दीपक कुमार पटेल और हरिशंकर बरोदिया' केस: अब दिल्ली में होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने जिन दो एसएलपी (विशेष अनुमति याचिकाओं) को रिकॉल किया है, वे 'दीपक कुमार पटेल विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन' और 'हरिशंकर बरोदिया विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन' से संबंधित हैं। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से 87:13 के विवादास्पद फॉर्मूले और 13% आरक्षण को होल्ड पर रखने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और विनायक प्रसाद शाह ने स्पष्ट किया कि इन दो मामलों की गंभीरता को देखते हुए अब सर्वोच्च अदालत अप्रैल के दूसरे हफ्ते में इन पर सुनवाई करेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के लिए यह कानूनी मोर्चा अब और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है क्योंकि इसका सीधा असर भर्ती परीक्षाओं के परिणामों पर पड़ना तय है।
हाईकोर्ट में 2 अप्रैल से दस्तक और विशेष बेंच का गठन
सुप्रीम कोर्ट के संशोधित निर्देश के बाद अब शेष 52 मामलों की सुनवाई 2 अप्रैल 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में नियत की गई है। कोर्ट की वेबसाइट पर 30 मार्च को अपलोड की गई जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट को अब इन मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाना होगा। ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से वरुण ठाकुर सहित अन्य सीनियर वकीलों ने पक्ष रखा है। राज्य सरकार की ओर से नियुक्त विशेष अधिवक्ताओं का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाएगा, हालांकि 13% होल्ड आरक्षण पर आने वाला फैसला ही प्रदेश की भावी नियुक्तियों की दिशा तय करेगा।



