नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आयकर अधिनियम, 2025 के तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र में रहने वाले अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय को दी गई आयकर छूट की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि यह मामला मूल रूप से कानून बनाने और नीतिगत फैसलों से जुड़ा है। अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी चिंताओं को संबंधित सरकारी अधिकारियों और संसद की समितियों के सामने रखने की सलाह दी।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, "यह शिकायत मुख्य रूप से विधायी (कानून से जुड़ा) मुद्दा है। संसद में ऐसी समितियां हैं, जहां कोई भी नागरिक कानूनों में सुधार या नए सुझाव दे सकता है। हमें विश्वास है कि जनप्रतिनिधि इन मुद्दों से अवगत हैं और इस पर विचार करेंगे।"
यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दाखिल की थी। उन्होंने या तो इस कर छूट प्रावधान को रद्द करने या फिर 'क्रीमी लेयर' व्यवस्था लागू करने की मांग की थी, ताकि केवल आर्थिक रूप से कमजोर अनुसूचित जनजाति के लोगों को ही इसका लाभ मिल सके।
याचिका में आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 11 और अनुसूची-3 की क्रम संख्या 19 को चुनौती दी गई थी। इसमें कहा गया था कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के अधिसूचित इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के लोगों को बिना किसी आय सीमा, संपत्ति संबंधी शर्त, क्रीमी लेयर नियम या समय-समय पर समीक्षा के आयकर से पूरी छूट दी जा रही है।
याचिका के अनुसार, यह छूट पहले आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10(26) के तहत उन जनजातीय समुदायों की सुरक्षा के लिए दी गई थी, जो भौगोलिक रूप से दूरदराज और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में रहते थे। लेकिन पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर क्षेत्र में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में काफी विकास हुआ है, जिससे परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बिना आय सीमा, क्रीमी लेयर, संपत्ति आधारित मानदंड और समय-समय पर समीक्षा के इस छूट को जारी रखना अब मनमाना और अत्यधिक व्यापक हो गया है।
याचिका में यह भी कहा गया कि इस कर छूट के कारण उसी क्षेत्र में समान आर्थिक परिस्थितियों में काम करने वाले अन्य व्यापारियों और पेशेवरों को नुकसान होता है, क्योंकि उन्हें यह छूट नहीं मिलती।
वैकल्पिक रूप से याचिकाकर्ता ने अदालत से केंद्र सरकार को क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने का निर्देश देने की मांग की थी। इसके तहत एक निश्चित वार्षिक आय से अधिक कमाने वाले अनुसूचित जनजाति के लोगों को कर छूट का लाभ न देने का प्रस्ताव रखा गया था।
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि आयकर छूट की सीमा तय करने और समय-समय पर उसकी समीक्षा करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को संबंधित विधायी मंचों पर अपनी बात रखने की सलाह दी।




