देश में राजनैतिक बिसात पर नित नये पैतरे देखने को मिल रहे हैं। स्वार्थवादी सिद्धान्तों ने संचयकारी सोच के साथ मिलकर आदर्शवादी मूल्यों को तिलांजलि देना शुरू कर दिया है। पार्टियों के मूल उद्देश्य किस्तों में कत्ल किया जा रहे है। दल-बदल से लेकर संगठनों के जोड-तोड तक की घटनायें सामने आ रहीं हैं। ऐसे में राजनैतिक दलों की स्थापनाओं और उनके उद्देश्यों के प्रकाश में वर्तमान की समीक्षा अतिआवश्यक हो जाती है। स्काटलैण्ड के मोंट्रोस शहर में जन्मे ब्रिटिश अफसर एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने 28 दिसंबर 1885 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों के शिक्षित और बुद्धिजीवी भारतीयों को एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान करना था ताकि भारतीयों की समस्याओं, शिकायतों और मांगों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष संवैधानिक ढंग से रखा जा सके लेकिन सन् 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान पार्टी एक जन-आंदोलन में बदलने लगी। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल यानी लाल-बाल-पाल जैसे नेताओं ने इसे ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ सीधे संघर्ष का रूप दे दिया। सन् 1907 के सूरत अधिवेशन में पार्टी की नीतियों के कारण उसका विभाजन गरम दल और नरम दल के रूप में हो गया। एक घटक ने आजाद हिन्द फौज बनाई तो दूसरे ने कांग्रेस पर कब्जा कर लिया। सन् 1920 में नागपुर अधिवेशन आयोजित किया गया। मोहनदास कर्मचन्द गांधी के आगमन के साथ कांग्रेस का चरित्र पूरी तरह बदल गया। पार्टी के संविधान में परिवर्तन किये गये। परिवर्तनों का यह क्रम आज तक चल रहा है। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को कलकत्ता में जन्मे डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान की थी। इस दल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक समर्थन प्राप्त था। कांग्रेसी प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के द्वारा सन् 1975 से 1977 कर आपातकाल लगा कर कथित तौर पर मनमानी, तानाशाही और गुण्डागिरी की गई। इसके विरोध स्वरूप सत्ताधारी कांग्रेस के विरोध में सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने एकजुट होकर बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा गांव में जन्मे जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सन् 1977 में जनता पार्टी का गठन किया गया जिसमें जनसंघ का भी विलय हो गया, परन्तु सन् 1980 में जनता पार्टी के भीतर दोहरी सदस्यता के विवाद और वर्चस्व की लड़ाई के कारण एक बडे घटक ने अटल बिहारी वाजपेई तथा लाल कृष्ण आडवारी के नेतृत्व में 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन कर लिया। पार्टी का उद्देश्य एकात्म मानववाद पर आधारित भारत को एक सशक्त, आत्मनिर्भर, और समृद्ध राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर स्थापित करना था। वहीं पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में स्थित अरबालिया गांव में जन्मे नरेंद्र नाथ भट्टाचार्य जिन्हें मानवेन्द्र नाथ राय भी कहा जाता है, ने उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व को समाप्त करके वर्गहीन और शोषण-मुक्त साम्यवादी समाज की स्थापना के उद्देश्य से 17 अक्टूबर 1920 को तत्कालीन सोवियत संघ के ताशकंद में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। उसके बाद 26 दिसंबर 1925 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में मानवेंद्र नाथ रॉय ने अपनी पत्नी इवलिन ट्रेंट रॉय और अबानी मुखर्जी के साथ मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया। महाराष्ट्र के पूना नगर में जन्मे बाल केशव ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना 19 जून 1966 को मुंबई में मराठी मानुष और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य की थी जो बाद में कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा वाली एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी के रूप में विकसित हुई। राम मंदिर आन्दोलन से लेकर सनातन के विभिन्न आन्दोलनों में शिवसेना ने अहम भूमिका का निर्वहन किया। इसी तरह उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गाँव में जन्मे मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना 4 अक्टूबर 1992 को डाक्टर राम मनोहर लोहिया की विचारधारा पर आधारित समानता की परिकल्पना को साकार करने हेतु की थी ताकि आर्थिक और सामाजिक समानता के सिद्धांतों की व्यवहारिक परिणति की जा सके। बहुजन समाज पार्टी की स्थापना पंजाब के रूपनगर यानी रोपण जिले के खवासपुर यानी पिरथीपुर बुंगा गांव में जन्मे कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को अंबेडकर जयंती के दिन की थी जिसका उद्देश्य डाक्टर भीमराव अंबेडकर, ज्योतिराव फुले तथा पेरियार के सिद्धान्तों के आधार पर कथित मनुवादी व्यवस्था को उखाडना था। पार्टी के संस्थापक का मानना था कि राजनीतिक सत्ता सभी समस्याओं की चाबी होती है। इसी तरह अनेक पार्टियों ने स्थापना काल में अनेक सकारात्मक उद्देश्यों का शंखनाद किया था। कहीं जातिगत हितों को साधने का मुद्दे रेखांकित किये गये तो कहीं भाषागत विभेद की खाई बढाने की कोशिशें हुईं। इन प्रयासों ने राजनैतिक रंग लेकर सत्ता सुख की कल्पनाओं को पंख देना शुरू कर दिये। वर्तमान में लगभग सभी पार्टियां अपने मूल सिद्धान्तों, आदर्शों और नीतियों को तिलांजलि देकर केवल और केवल स्वार्थ सिद्धि के प्रयासों में लगी हैं। चुनावी जंग से लेकर सिंहासन तक पहुंचने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद आजमाये जा रहे हैं। वर्तमान उप चुनाव में मध्य प्रदेश का दतिया और बिहार का बांकीपुर का टिकिट वितरण इसी का एक जीता जागता उदाहरण है। पार्टियों के लिए समर्पण, त्याग और सेवा के मूल्य समाप्त हो चुके हैं। चाटुकारिता, निजी हित और वैभव संकलन की संभावनायें ही योग्यता के नये मापदण्ड बन गये हैं। सिद्धान्तविहीन राजनीति का बदलता चेहरा किसी भी दशा में राष्ट्रहित की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। ऐसे में आम आवाम की राय कायम करने में वर्तमान कार्य, राष्ट्रीय प्रगति और समस्याओं से निजात पाने वाले कारक ही उत्तरदायी होंगे। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
सिद्धान्तविहीन राजनीति का बदलता चेहरा

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Saurabh Shukla
12 जुलाई 2026, 11:22 am IST
Saurabh Shukla12 जुलाई 2026, 11:22 am IST



