नई दिल्ली। भारत को अपने नेट-जीरो लक्ष्य को हासिल करने के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता में बड़ी कमी लानी होगी और अपनी कुल ऊर्जा खपत में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक करनी होगी। यह बात नीति आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कही।हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ट्रेड प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (टीपीसीआई) द्वारा आयोजित इंडिया बायो एनर्जी कॉन्फ्रेंस (आईबीईसी) 2026 में बोलते हुए नीति आयोग के सलाहकार (ऊर्जा) राजनाथ राम ने कहा कि वर्तमान में भारत की प्राथमिक ऊर्जा खपत का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों से आता है, जबकि नवीकरणीय और गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी केवल 15 से 18 प्रतिशत के बीच है।
उन्होंने कहा, "यदि आप वास्तव में नेट-जीरो देश बनना चाहते हैं, तो आपकी प्राथमिक ऊर्जा व्यवस्था, जो अभी जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों पर अत्यधिक निर्भर है, उसे पूरी तरह बदलना होगा।"
तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच ऊर्जा सुरक्षा के महत्व पर जोर देते हुए राम ने कहा कि भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों और आयात के स्रोतों में विविधता लाने के साथ-साथ घरेलू संसाधनों का बेहतर उपयोग भी करना होगा।
उन्होंने बताया कि हालिया वैश्विक व्यवधानों के बाद भारत ने अपने ऊर्जा आयात नेटवर्क को 27 देशों से बढ़ाकर 40 से अधिक देशों तक विस्तारित किया है।
इसके अलावा, उन्होंने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में कोयला गैसीकरण की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि देश के पास लगभग 300 अरब टन कोयले का भंडार है, जिसका उपयोग सिंथेटिक प्राकृतिक गैस और अन्य औद्योगिक उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
सरकार द्वारा हाल ही में मंजूर की गई 37,500 करोड़ रुपए की कोयला गैसीकरण पहल का उल्लेख करते हुए राम ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य घरेलू कोयला और लिग्नाइट भंडार को संश्लेषण (सिंथेसिस) गैस में बदलना है, जिसका उपयोग सिंथेटिक प्राकृतिक गैस, मेथेनॉल और अन्य औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जा सकेगा।
उन्होंने कहा, "यदि यह सिंथेटिक प्राकृतिक गैस देश में तैयार की जाती है, तो इससे प्राकृतिक गैस के आयात की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो सकती है।"
वहीं, टीपीसीआई के चेयरमैन मोहित सिंगला ने बायो-ऊर्जा को भारत के हरित विकास एजेंडा का एक रणनीतिक स्तंभ और ऊर्जा परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
सिंगला ने कहा, "बायो-ऊर्जा केवल एक वैकल्पिक ईंधन स्रोत नहीं है, बल्कि यह भारत की हरित विकास यात्रा का एक रणनीतिक आधार है, जो भविष्य में ऊर्जा परिवर्तन की मजबूत नींव बन सकती है।"
उन्होंने कहा कि बायो-ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ कचरा प्रबंधन की समस्या का समाधान, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार हो सकती है।
सम्मेलन के दौरान टीपीसीआई ने सतत विमानन ईंधन (एसएएफ) एसोसिएशन के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर किए, ताकि इस क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत किया जा सके।
इस सम्मेलन में नीति-निर्माता, राजनयिक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और ऊर्जा विशेषज्ञ एक साथ आए और उन्होंने संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी), एथेनॉल मिश्रण, सतत विमानन ईंधन (एसएएफ), जलवायु वित्त, बायोमास एकीकरण और भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की रणनीतियों पर चर्चा की।

