लखनऊ। बहु दवा प्रतिरोधी (एमडीआर) टीबी से जूझ रहे मरीजों के इलाज में नई चुनौती सामने आई है। एमडीआर टीबी के साथ टाइप-2 मुधमेह से पीड़ित मरीजों पर टीबी की दवाओं का असर काफी धीमा होता है। इससे संक्रमण खत्म होने में अधिक समय लगता है। ऐसे में लंबे समय तक इलाज चलने के कारण दोनों बीमारियों से ग्रसित मरीजों में मौत का जोखिम बढ़ जाता है।किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में हुए अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है। इसे वर्ल्ड जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन में स्थान मिला है। केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के वर्ष 2023 से 2024 के बीच हुए अध्ययन में 264 एमडीआर टीबी मरीजों को शामिल किया गया। इसमें 155 पुरुष और 109 महिलाएं थीं। जिसमें 61 मरीज टाइप-2 मधुमेह, 66 प्री-डायबिटीज (बॉर्डरलाइन मधुमेह) और 137 रोगी मधुमेह रहित थे। इन्हें तीन समूहों में बांटने के बाद सभी मरीजों को मुंह से ली जाने वाली टीबी की दवाएं दी गईं।
इलाज के दौरान समय-समय पर उनकी बलगम जांच और सेहत में सुधार की निगरानी की गई। शोध में पाया गया कि मधुमेह पीड़ित मरीजों के फेफड़ों में अन्य रोगियों की तुलना गंभीर संक्रमण और टीबी के ज्यादा जीवाणु मौजूद थे। जीवाणुओं में दवा प्रतिरोध बढ़ाने वाले आईएनएचए और केएटीजी जीन में म्यूटेशन मिला। इलाज के नतीजों की तुलना में सामने आया कि मुधमेह मरीजों की बलगम जांच निगेटिव होने में सबसे अधिक 133 दिन लगे। वहीं, प्री-डायबिटीज मरीजों में 113 और गैर-मधुमेह रोगियों की जांच रिपोर्ट सिर्फ 97 दिन में सामान्य हो गई।
शोध में पता चला कि मुधमेह के साथ प्री—डायबिटीज भी एमडीआर टीबी का इलाज प्रभावित करती है। केजीएमयू के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के संस्थापक प्रभारी प्रो. सूर्यकांत के मुताबिक, भारत में टीबी और मधुमेह तेजी से बढ़ रही गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियां हैं। एमडीआर टीबी में मधुमेह एक बड़ा जोखिम कारक है। इसलिए इस बीमारी से पीड़ित मरीज की मधुमेह और प्री-डायबिटीज जांच जरूरी है। मरीजों की निगरानी और दोनों बीमारियों का एक साथ इलाज होने से बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।
सह-मार्गदर्शक डॉ. अजय कुमार वर्मा ने कहा कि एमडीआर टीबी के उपचार में केवल प्रभावी एंटी-टीबी दवाएं पर्याप्त नहीं हैं। टीबी और मधुमेह की एकीकृत देखभाल (इंटीग्रेटेड टीबी टीबी डायबिटीज केयर) अपनाने से कल्चर कन्वर्जन में सुधार, उपचार की सफलता में वृद्धि तथा मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है।
केजीएमयू के श्वसन रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ ज्योति बाजपेयी ने कहा कि दुनिया में सबसे अधिक टीबी और मधुमेह के मरीज भारत में हैं। मधुमेह से एमडीआर टीबी के मरीजों पर दवाएं देर से असर करती हैं। ऐसे मरीजों में मधुमेह की जांच और इसे नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। इससे एमडीआर टीबी मरीजों के ठीक होने की दर बढ़ेगी। साथ ही राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन अभियान को भी मजबूती मिलेगी।
शोध में इनका भी रहा योगदान। इस शोध में डॉ. योगिता वात्स, डॉ. अजय कुमार वर्मा, डॉ. पारुल जैन, डॉ. दर्शन बजाज, डॉ. आनंद श्रीवास्तव, डॉ. राम अवध सिंह कुशवाहा, डॉ. संतोष कुमार, डॉ. राजीव गर्ग, डॉ. अंकित कुमार तथा डॉ. अक्षय प्रधान का अहम योगदान रहा।
एमडीआर टीबी का मतलब मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (दवा प्रतिरोधी टीबी) है। यह सामान्य ड्रग-सेंसिटिव या शुरुआती टीबी के मुकाबले ज्यादा घातक होती है। इसमें टीबी के जीवाणुओं पर इस बीमारी की सबसे असरदार दवाएं बेअसर हो जाती हैं।
मरीजों को लंबे समय तक इलाज कराना पड़ता है। इसके कारण मृत्यु दर भी अधिक होती है। एमडीआर टीबी के कारण अधूरा इलाज, अनियमित व गलत दवा का सेवन, एमडीआर टीबी मरीज के जरिए संक्रमण, जीवाणुओं का म्यूटेशन, और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता एमडीआर टीबी की जाचें सीबी-नैट, जीन एक्सपर्ट, ट्रूनेट, एलपीए, और बीडी मैक्स।




