नई दिल्ली। अर्थशास्त्रियों और उद्योग विशेषज्ञों ने सोमवार को सरकार द्वारा नए उत्पादक मूल्य सूचकांक यानी प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) फ्रेमवर्क को लागू किए जाने का स्वागत किया। उनका कहना है कि इससे महंगाई की निगरानी और मजबूत होगी, उद्योग स्तर पर कीमतों की बेहतर ट्रैकिंग संभव होगी और भारत की सांख्यिकीय प्रणाली वैश्विक मानकों के अनुरूप बनेगी।सरकार ने संशोधित थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) सीरीज के साथ-साथ आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (ओपीपीआई), ट्रायल इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (आईपीपीआई) और सेवा प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) को 2022-23 को आधार वर्ष बनाकर लागू किया है, जो देश के मुद्रास्फीति माप ढांचे में एक बड़ा बदलाव है।

केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने कहा कि आउटपुट पीपीआई, ट्रायल इनपुट पीपीआई और सर्विसेज पीपीआई की शुरुआत घरेलू मूल्य सूचकांकों को अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

वहीं, पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने इस नई सीरीज को एक महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण पहल बताया। उन्होंने कहा कि इससे भारत के महंगाई संबंधी आंकड़े वैश्विक स्तर पर स्वीकार किए जाने वाले मानकों के और करीब पहुंचेंगे।

पीएचडीसीसीआई के अनुसार, अगले पांच वर्षों तक डब्ल्यूपीआई और पीपीआई दोनों का समानांतर प्रकाशन महंगाई के विश्लेषण को मजबूत करेगा, उद्योग स्तर पर निगरानी को बेहतर बनाएगा और नए फ्रेमवर्क में सुचारु बदलाव सुनिश्चित करेगा।

इस बीच, सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मई महीने में वार्षिक थोक महंगाई दर बढ़कर 9.68 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल में 8.26 प्रतिशत थी।

यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईंधन और ऊर्जा की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण हुई। मई में ईंधन और बिजली (फ्यूल एंड पावर) महंगाई बढ़कर 30.33 प्रतिशत पर पहुंच गई। वहीं, विनिर्मित उत्पादों (मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स) की महंगाई 7.48 प्रतिशत रही, जबकि खाद्य महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित स्तर पर 4.49 प्रतिशत रही।

रजनी सिन्हा ने कहा, "हालांकि सभी प्रमुख समूहों में महंगाई बढ़ी है, लेकिन ईंधन, बिजली और विनिर्मित वस्तुओं में वृद्धि सबसे अधिक देखने को मिली है। यह पश्चिम एशिया संकट के थोक कीमतों पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाता है।"

उन्होंने अनुमान जताया कि यदि ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो डब्ल्यूपीआई महंगाई औसतन 7.8 प्रतिशत रह सकती है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि इस वर्ष एल नीनो की संभावना अधिक होने के कारण खाद्य महंगाई का जोखिम भी बना हुआ है।

सिन्हा के अनुसार, पश्चिम एशिया में हालिया सकारात्मक घटनाक्रमों के बाद वैश्विक ऊर्जा कीमतों में काफी नरमी आई है, हालांकि स्थिति अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं है।

उन्होंने कहा, "अब तक तेल विपणन कंपनियों और सरकार ने कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का बड़ा हिस्सा अपने स्तर पर संभाला है। हालांकि आगे घरेलू कच्चे तेल की कीमतों की दिशा वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।"

वहीं, बजाज ब्रोकिंग के शाश्वत सिंह ने कहा कि मई महीने में थोक महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण ईंधन और बिजली क्षेत्र की महंगाई रही, जिसमें कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और खनिज तेलों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी शामिल है।

उन्होंने कहा कि खुदरा महंगाई के स्थिर रहने से उपभोक्ता मांग को समर्थन मिल रहा है, लेकिन ईंधन और ऊर्जा लागत के कारण थोक महंगाई में दिख रहा लागत आधारित दबाव (कॉस्ट-पुश प्रेशर) मौजूदा भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच निकट भविष्य में जोखिम बना रह सकता है।

गौरतलब है कि सरकार ने डब्ल्यूपीआई का पुराना आधार वर्ष 2011-12 हटाकर 2022-23 को नया आधार वर्ष बनाया है।

नई व्यवस्था के तहत वस्तुओं की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है। साथ ही वेटेज की गणना ग्रॉस वैल्यू ऑफ आउटपुट (जीवीओ) के आधार पर की जाएगी। यह बदलाव देश में एक व्यापक प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स प्रणाली विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।