बैतूल, सुरेन्द्र बावने। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले सहित चिचोली तहसील में शिक्षा जगत से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकार और शिक्षकों के बीच सीधा टकराव पैदा कर दिया है। सालों से स्कूलों में बच्चों का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षकों ने अब खुद 'परीक्षा' देने से साफ मना कर दिया है। लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा अनिवार्य की गई शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर जिले भर के शिक्षकों में भारी आक्रोश है। इसी विरोध के चलते चिचोली तहसील कार्यालय में मध्य प्रदेश शिक्षक संघ के बैनर तले बड़ी संख्या में जुटे शिक्षकों ने तहसीलदार प्रेम सिंह दिवान को मुख्यमंत्री मोहन यादव के नाम एक कड़ा ज्ञापन सौंपा है।
इस पूरे विरोध की जड़ साल 2009 के उस अदालती निर्देश में छिपी है, जिसके आधार पर प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों के लिए TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है। शिक्षक संघ के तहसील अध्यक्ष आशीष भुसारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे इस पात्रता परीक्षा का पुरजोर विरोध करते हैं और इसे तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए। शिक्षकों का मानना है कि जो गुरु दशकों से शिक्षा दे रहे हैं, उन्हें अब पात्रता साबित करने के लिए परीक्षा की दहलीज पर खड़ा करना उनके अनुभव का अपमान है।
विरोध का एक बड़ा कारण उम्र और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी हैं। संघ के उपाध्यक्ष मनीष आर्य ने दर्द साझा करते हुए कहा कि इस उम्र में परीक्षा के तनाव से शिक्षकों की छवि तो धूमिल होगी ही, साथ ही उन्हें गंभीर मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने तर्क दिया कि कई शिक्षक अब सेवानिवृत्ति के करीब हैं और पारिवारिक उलझनों के कारण पढ़ाई के उस दबाव को झेलने की स्थिति में नहीं हैं। कोषाध्यक्ष योगेंद्र सूर्यवंशी सहित अन्य शिक्षकों ने भी एक सुर में मांग उठाई है कि सरकार को शिक्षकों के अनुभव का सम्मान करते हुए इस परीक्षा को तुरंत रद्द करना चाहिए। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय इस ज्ञापन पर क्या रुख अपनाता है और क्या गुरुओं को इस 'अग्निपरीक्षा' से राहत मिलती है।



