भारतीय लोकतंत्र आज एक अत्यंत संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। स्वतंत्रता के अमृतकाल में जहां एक पारदर्शी, जवाबदेह और लोक-कल्याणकारी व्यवस्था की आशा है वहीं धरातल पर स्थितियां इसके विपरीत होती जा रही हैं। राजनीति जनसेवा का माध्यम न रहकर विशुद्ध रूप से सत्ता और स्वार्थ का खेल बन चुकी है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गिरावट का सीधा असर देश के प्रशासनिक तंत्र यानी कार्यपालिका पर पड़ा है। जब राजनीति सिद्धांतविहीन हो जाती है, तो कार्यपालिका भी अपने संवैधानिक दायित्वों से विमुख होकर सत्ताधारियों और रसूखदारों के इशारों पर नाचने लगती है। ऐसे में अब आम नागरिक इस समूची व्यवस्था में सबसे लाचार, उपेक्षित और शोषित घटक बनकर रह गया है। शरीर के पांच तत्वों की तरह ही वर्तमान समाज भी पांच नये कारक स्थापित हो चुके हैं। बाहुबल, धनबल, भीड़बल, पहुंचबल और आतंकबल का परचम फहराने लगा है। चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली प्रतिष्ठित संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर की रिपोर्ट्स में इस कड़वी सच्चाई को लगातार रेखांकित किया जाता रहा है। वर्तमान में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में दागी और करोड़पति जनप्रतिनिधियों की संख्या 40 प्रतिशत से कहीं अधिक है। जब कानून बनाने वाली संस्थाओं में ही ऐसे तत्वों का वर्चस्व होगा तब कानून का पालन कराने वाला तंत्र तो स्वार्थसिद्धि के लिए स्वच्छन्द हो ही जायेगा। कद्दावर नेताओं के असंवैधानिक कार्यों को अनदेखा करने के बदले में राजसेवकों की निरंतर चांदी ही हो रही है। किसी बलशाली के विरुद्ध कार्रवाई करने की हिम्मत जुटाना आज के ईमानदार अधिकारी के लिए भी अपनी नौकरी, स्थानांतरण और सम्मान को दांव पर लगाने जैसा हो गया है। अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने के कारण पुलिस तंत्र अक्सर निष्पक्ष जांच करने में विफल रहता है। इससे आम जनता का कानून से भरोसा उठने लगा है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। राजनीति के इस पतन का सबसे वीभत्स रूप हमें सरकारी विभागों में देखने को मिलता है, जहां भ्रष्टाचार अपनी चरमसीमा पर है। बिना सुविधा शुल्क के किसी भी आम नागरिक का वैध काम होना भी असंभव सा हो गया है। वैश्विक भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक यानी सीपीआई में भारत का स्थान दुनिया के 180 देशों में लगातार 85वें से 93वें स्थान के बीच झूल रहा है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक भले ही भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करें, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश मामलों में तहसील कार्यालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, बिजली विभाग और पुलिस थानों आदि शासकीय संस्थाओं में सुविधाशुल्क या बलशाली के फोन के बिना के पत्ता भी नहीं हिलता। यह राशि या फोन केवल प्रक्रिया को तेज करने के लिए नहीं होता बल्कि कई बार नागरिकों को उनके वैध अधिकारों से वंचित करने की धमकी देकर भी जबरन वसूला जाता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में आज भी लगभग आधे से अधिक नागरिकों को बुनियादी सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए कभी न कभी रिश्वत देने पर मजबूर होना पड़ता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोग, जिनके पास न तो राजनीतिक पहुंच है और न ही देने के लिए भारी-भरकम रकम, वे इस व्यवस्था की चक्की में पीसने को मजबूर हैं। इस तरह की रिपोर्ट्स पर उत्तरदायी अधिकारी धृतराष्ट्र बनकर स्वार्थरूपी दुर्योधन को संरक्षित करने में लगे रहते हैं। सरकारी सेवकों द्वारा जानबूझकर की गई गलतियों का खामियाजा भी पीड़ित नागरिक को ही भुगतना पड़ता है। राजस्व रिकॉर्ड में त्रुटिपूर्ण नाम से लेकर गलत बिजली बिल तक, पेंशन के रुकने से लेकर आधार-राशन कार्ड में गलतियां आदि के लिए पीडित को स्वयं ही दफ्तरों के अनगिनत चक्कर काटने पड़ते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का रवैया इतना असंवेदनहीन हो चुका है कि वे अपनी गलती मानने के बजाय पीड़ित को ही दोषी सिद्ध करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं। वर्तमान समय में डिजिटलाइजेशन के नाम पर पोर्टल, वेबसाइट आदि के लिए बनाये गये विभागों में नियुक्त स्थाई कर्मचारियों, वहां के संसाधनों, उपकरणों, व्यवस्थाओं आदि पर करदाताओं की धनराशि का एक बडा भाग खर्च किया जा रहा है तिस पर बाह्य विशेषज्ञों से अनुबंध, सेवा प्रदाताओं की नियुक्तियां और संविदाकर्मियों का सहयोग भी लिया जा रहा है। विभागीय अधिकारी, कर्मचारी सक्षम नहीं हैं तो फिर उनकी नियुक्तियां की ही क्यों गईं। संविदाकर्मियों को ही स्थाई नियुक्तियां क्यों नहीं दी गईं। इतना सब कुछ होने के बाद भी अधिकांश विभागों की वेबसाइट तथा पोर्टल आदि अपूर्ण होते हैं, मेन्टीनेन्स में होते हैं या फिर अपडेट नहीं होते हैं। डिजिटल के नाम पर नित परिवर्तित प्रपत्र, परिवर्तित व्यवस्थायें, परिवर्तित तकनीक और परिवर्तित तंत्र समाने आते हैं जिनमें उलझकर आम आदमी के सामने कार्यपालिका के संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के सामने समर्पण करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। राष्ट्रीय सतर्कता आयोग यानी सीवीसी के पास हर साल सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार की हजारों शिकायतें पहुंचती हैं लेकिन न्याय की कछुआ गति इस शोषण को और बढ़ाती है। सिटिजन चार्टर यानी नागरिक अधिकार पत्र जैसी व्यवस्थाएं केवल फाइलों और दीवारों पर शोभा बढ़ा रही हैं, धरातल पर उनकी जवाबदेही तय करने वाला कोई नहीं है। यदि समय रहते इस निरंकुश प्रशासनिक तंत्र पर लगाम नहीं कसी गई तो कार्यपालिका के ये भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही उदरस्थ कर लेंगे। ऐसी विकट परिस्थितयों में आम आवाम को स्वयं ही जागरूक होना होगा। जब तक देश का आम नागरिक मूकदर्शक बनकर जाति, धर्म, क्षेत्र या हरामखोरी के जाल में फंसकर अपना वोट बेचता रहेगा, तब तक यह व्यवस्था ऐसे ही शोषित करती रहेगी। वास्तविकता तो यह है कि लोकतंत्र में आम आवाम प्रजा नहीं बल्कि स्वामी है और अधिकारी हैं जनसेवक। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
बलशालियों के समक्ष मौथला होता कानूनी हथियार

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Saurabh Shukla
19 जुलाई 2026, 07:49 am IST
Saurabh Shukla19 जुलाई 2026, 07:49 am IST



