चेन्नई। मद्रास हाई कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ डीएमके नेता के.एन. नेहरू की एक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। यह याचिका ईडी की ओर से साझा की गई सामग्री के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज करने के कोर्ट के पिछले निर्देश के खिलाफ दायर की गई थी।मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में फरवरी के आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की गई थी। फरवरी के उस आदेश में सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) को तुरंत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
के.एन. नेहरू और उनके भाइयों ने निर्देश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि इसे जारी करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना गया था। उन्होंने तर्क दिया कि यह आदेश 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
राज्य सरकार ने भी पुनर्विचार की मांग की थी। हालांकि, 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद नई सरकार के सत्ता में आने पर उसका रुख बदल गया। इसके बाद एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने कोर्ट को सूचित किया कि डीवीएसी ने नेहरू के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है और सरकार अपनी पुनर्विचार याचिका वापस लेना चाहती है।
पीठ ने सवाल किया कि जब राज्य ने पहले कोई कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया था, तो मामला कैसे दर्ज कर लिया गया? नारायण ने कहा कि पिछली सरकार के निर्देशों पर काम करते हुए पूर्व एडवोकेट जनरल की ओर से दिया गया आश्वासन नई सरकार पर लागू नहीं होता है। इसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी होने तक राज्य को नेहरू के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से रोक दिया।
नेहरू की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि उनके मुवक्किल को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिए जाने से पहले अपनी बात रखने का अधिकार था। उन्होंने तर्क दिया कि 'प्राकृतिक न्याय' का उल्लंघन होने पर मामले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, भले ही आपराधिक कार्यवाही में पुनर्विचार याचिका की स्वीकार्यता पर आपत्तियां हों।
डीवीएसी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने इसका जवाब देते हुए कहा कि कानून के अनुसार, कोर्ट द्वारा एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से पहले आरोपी का पक्ष सुनना जरूरी नहीं है। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 362 का हवाला देते हुए दवे ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट सहित किसी भी अदालत को आपराधिक मामलों में अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने की अनुमति नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या नेहरू किसी दूसरे व्यक्ति की याचिका पर पारित आदेश के खिलाफ पुनर्विचार की मांग कर सकते हैं।
नारायण ने तर्क दिया कि नेहरू को इस कार्यवाही के बारे में पता था, लेकिन उन्होंने आदेश आने तक इंतजार किया और उसके बाद इसे चुनौती दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने मुकदमे की कार्यवाही में देरी करने और एक वरिष्ठ मंत्री को बचाने की कोशिश की थी। पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और उस समय अंतरिम सुरक्षा बढ़ा दी थी। सोमवार को उसने नेहरू की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।

















