नई दिल्ली, 8 मई । दुनिया के सबसे महान पर्वतारोहियों में गिने जाने वाले तेनजिंग नोर्गे ने माउंट एवरेस्ट पर पहली सफल चढ़ाई कर इतिहास रच दिया था। 9 मई, 1986 को दुनिया से अलविदा कहने वाले तेनजिंग नोर्गे ने 29 मई, 1953 को न्यूजीलैंड के पर्वतारोही एडमंड हिलेरी के साथ एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर मानव साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति का नया अध्याय लिखा था।

तेनजिंग नोर्गे का जन्म 1914 में नेपाल के खुम्बू क्षेत्र में हुआ था। हालांकि उनकी जन्मतिथि को लेकर मतभेद हैं, लेकिन सामान्यतः मई 1914 को स्वीकार किया जाता है। तेनजिंग के प्रारंभिक जीवन के बारे में विरोधाभासी विवरण मिलते हैं। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि वे एक शेरपा थे, जिनका जन्म और पालन-पोषण पूर्वोत्तर नेपाल के खुंबू जिले के तेंगबोचे में हुआ था। 1985 में ऑल इंडिया रेडियो को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता तिब्बत से आए थे, लेकिन उनका जन्म नेपाल में हुआ था।

तेनजिंग नोर्गे का परिवार बेहद साधारण था और वे शेरपा समुदाय से संबंध रखते थे। शेरपा लोग हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले मेहनती और साहसी समुदाय के रूप में जाने जाते हैं। बचपन से ही तेनजिंग का जीवन कठिन परिस्थितियों में बीता। ऊंचे पहाड़, बर्फीला मौसम और सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने संघर्ष करना सीखा। पर्वतों के प्रति उनका आकर्षण बचपन से ही था और यही आकर्षण आगे चलकर उन्हें विश्व प्रसिद्ध पर्वतारोही बना गया।

युवावस्था में तेनजिंग दार्जिलिंग आ गए, जो उस समय पर्वतारोहण अभियानों का प्रमुख केंद्र था। यहां उन्होंने एक कुली और गाइड के रूप में काम शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने पर्वतारोहण की तकनीकें सीखीं और कई अभियानों में हिस्सा लिया।

1930 और 1940 के दशक में उन्होंने कई बार एवरेस्ट अभियान में भाग लिया, लेकिन मौसम, तकनीकी कठिनाइयों और संसाधनों की कमी के कारण सफलता नहीं मिल सकी। हालांकि इन असफलताओं ने उनके हौसले को कमजोर नहीं किया।

1953 में ब्रिटिश अभियान दल ने एक बार फिर एवरेस्ट फतह करने की योजना बनाई। इस अभियान का नेतृत्व जॉन हंट कर रहे थे। तेनजिंग नोर्गे को उनकी क्षमता और अनुभव के कारण दल में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई। लंबे और कठिन सफर के बाद, 29 मई 1953 की सुबह तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे। यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी गई। चोटी पर पहुंचकर तेनजिंग ने वहां मिठाई और बिस्कुट अर्पित किए, जबकि हिलेरी ने तस्वीरें खींचीं। यह उपलब्धि केवल दो व्यक्तियों की जीत नहीं थी, बल्कि पूरी मानवता के साहस का प्रतीक बन गई। एवरेस्ट पर चढ़ाई के बाद, तेनजिंग ने उसी दिन अपना जन्मदिन मनाने का फैसला किया।

एवरेस्ट विजय के बाद तेनजिंग नोर्गे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गए। उन्हें भारत, नेपाल और दुनिया के कई देशों में सम्मान मिला। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। उन्होंने दार्जिलिंग स्थित हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट में निदेशक के रूप में भी काम किया और नई पीढ़ी के पर्वतारोहियों को प्रशिक्षण दिया।

तेनजिंग नोर्गे बेहद विनम्र और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वे मानते थे कि सफलता केवल शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और टीमवर्क से मिलती है। उन्होंने हमेशा शेरपा समुदाय के योगदान को सम्मान दिलाने की कोशिश की। उनका जीवन यह संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियां भी किसी व्यक्ति के सपनों को रोक नहीं सकतीं, यदि उसके भीतर दृढ़ संकल्प हो।

नोरगे ने तीन बार शादी की थी। उनकी पहली पत्नी दावा फुटी 1944 में कम उम्र में ही चल बसीं। उनके एक बेटा नीमा दोरजे की चार साल की उम्र में मृत्यु हो गई। नोरगे की दूसरी पत्नी आंग लाहमू थीं, जो उनकी पहली पत्नी की चचेरी बहन थीं। तीसरी पत्नी दक्कू थीं, जिनसे उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी के जीवित रहते हुए ही शादी कर ली थी, जैसा कि शेरपा रीति-रिवाज के अनुसार अनुमत था। नोरगे का निधन 9 मई 1986 को दार्जिलिंग में हो गया था। उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार हिमालय पर्वतारोहण संस्थान, दार्जिलिंग में किया गया, जो उनका पसंदीदा स्थान था।

तेनजिंग की उपलब्धियां आज भी पर्वतारोहण की दुनिया में प्रेरणा का स्रोत हैं। हर वर्ष हजारों पर्वतारोही एवरेस्ट पर चढ़ने का सपना देखते हैं और तेनजिंग नोर्गे की कहानी से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। आज तेनजिंग नोर्गे केवल एक पर्वतारोही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और सफलता के प्रतीक माने जाते हैं। उनकी उपलब्धि ने हिमालयी क्षेत्रों और शेरपा समुदाय को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। उनके नाम पर स्कूल, संस्थान और पर्वतारोहण पुरस्कार स्थापित किए गए हैं।