छतरपुर/जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर) ने छतरपुर स्थित प्रसिद्ध जनराय टोरिया मंदिर की जमीन से जुड़े एक बेहद अहम मामले में ऐतिहासिक और नज़ीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मंदिर के महंत को धार्मिक संस्था एवं उसकी संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार तो हो सकता है, लेकिन वह मंदिर की भूमि को अपनी निजी या व्यक्तिगत संपत्ति बताकर उस पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता।

जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें महंत द्वारा मंदिर की करीब 67 एकड़ भूमि को अपने व्यक्तिगत नाम पर घोषित करने वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था (Mahant Bhagwandas Sadik Shishya v. State of MP, First Appeal No. 249 of 1998)।


क्या था मामला और अपीलकर्ता की दलीलें

मामले में अपीलकर्ता महंत ने तर्क दिया था कि मंदिर में महंत पद का उत्तराधिकार वर्षों से चली आ रही 'गुरु-शिष्य परंपरा' के अनुसार होता है। वह वर्तमान में मंदिर का महंत होने के नाते मंदिर और उसकी चल-अचल संपत्तियों के प्रबंधन का पूर्ण अधिकार रखता है। अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी थी कि पूर्व में कई बार राजस्व रिकॉर्ड (खसरा-खतौनी) में महंतों के नाम दर्ज रहे हैं और जमीन से जुड़ी विभिन्न राजस्व कार्यवाहियों में भी उनका उल्लेख रहा है, इसलिए इस भूमि पर उनका मालिकाना हक स्वीकार किया जाए।

राज्य सरकार की ओर से इस याचिका का कड़ा विरोध किया गया। शासकीय अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संबंधित 67 एकड़ जमीन किसी महंत की स्वयं-अर्जित या निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक मंदिर से जुड़ी हुई संस्थागत भूमि है। राज्य का स्पष्ट कहना था कि महंत केवल मंदिर की व्यवस्थाओं और पूजा-पाठ के संचालन का प्रबंधक (Manager/Trustee) हो सकता है, लेकिन इसके आधार पर वह सार्वजनिक मंदिर की जमीन का निजी स्वामी नहीं बन सकता।


क्यों खारिज हुई याचिका...?

1. मांगी गई राहत की नींव ही कानूनी रूप से गलत

हाईकोर्ट ने दलीलों का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस मामले में मांगी गई मुख्य राहत ही मूल रूप से गलत कानूनी आधार पर टिकी थी। कोर्ट ने गौर किया कि अपीलकर्ता ने यह घोषणा नहीं मांगी थी कि वह मंदिर का वैधानिक महंत है या उसे प्रबंधन का अधिकार है, बल्कि उसने सीधे तौर पर पूरी 67 एकड़ जमीन को अपने 'निजी नाम' पर घोषित करने की मांग की थी, जो कानूनी रूप से कतई स्वीकार्य नहीं है।


2. संपत्ति बेचने या हस्तांतरित करने का पैदा हो जाएगा खतरा

जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि ऐसी राहत दे दी जाती है, तो इसका गंभीर परिणाम यह होगा कि महंत मंदिर की देव-संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति समझकर उसे बेचने, बंधक रखने या हस्तांतरित करने लगेंगे। अदालत ने रेखांकित किया कि धार्मिक संस्थाओं और देवस्थानों की संपत्तियों की सुरक्षा सर्वोपरि है। इस संदर्भ में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध एम. सिद्दीक (राम जन्मभूमि मंदिर केस) के सिद्धांतों का भी विशेष उल्लेख किया।


3. भूमि नीलामी से मालिकाना हक नहीं बदलता

राज्य सरकार द्वारा मंदिर की कुछ भूमि की नीलामी किए जाने के सवाल पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह नीलामी केवल एक वर्ष के लिए खेती (कृषि कार्य) करने के अधिकार तक सीमित थी। इससे भूमि के मूल स्वामित्व (Ownership) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न ही मालिकाना हक हस्तांतरित होता है।


मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महंत की अपील को सिरे से खारिज करते हुए यह सिद्धांत पुन: स्थापित किया है कि "मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करना और उसका व्यक्तिगत मालिक होना, दो अलग-अलग बातें हैं।" इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि छतरपुर के जनराय टोरिया मंदिर की 67 एकड़ बेशकीमती जमीन किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति न होकर मंदिर और उससे जुड़ी धार्मिक व्यवस्था की ही रहेगी।