लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए अब जिलों और विभागों की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे एयरशेड को एक इकाई मानकर काम करने की तैयारी है। चीन के बीजिंग-तियानजिन-हेबेई मॉडल से सीख लेते हुए प्रदेश में ‘एक एयरशेड, एक प्लान’ की रणनीति बनाई जा रही है। इसके तहत करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से प्रदूषण की निगरानी, स्रोतों की पहचान और एकीकृत निर्णय समर्थन प्रणाली को मजबूत किया जाएगा।


विश्व बैंक की तकनीकी सहायता से 25 जुलाई से दो अगस्त तक चीन के बीजिंग, शिजियाझुआंग, वुहान और यिचांग का दौरा करने वाले वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार सक्सेना के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने वहां की वायु गुणवत्ता प्रबंधन व्यवस्था का अध्ययन किया। चीन में पूरे क्षेत्र को एक एयरशेड मानकर साझा डाटा और समान मानकों के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण की कार्रवाई की जाती है।



उत्तर प्रदेश इंडो-गैंगेटिक एयरशेड का हिस्सा है, इसलिए यहां की हवा पर आसपास के राज्यों और पड़ोसी देशों के प्रदूषण का भी असर पड़ता है। हालांकि पीएम 2.5 के करीब 56 प्रतिशत स्रोत प्रदेश की अपनी सीमा के भीतर हैं। ऐसे में बाहरी प्रदूषण के साथ प्रदेश के आंतरिक स्रोतों पर भी एक साथ कार्रवाई की जाएगी।


प्रदेश में सैटेलाइट, टावर, ग्राउंड सेंसर, मोबाइल लैब और एआई आधारित तकनीक को एक प्लेटफार्म से जोड़ने की योजना है। उद्योगों से उत्सर्जन का रियल टाइम डाटा लिया जाएगा और प्रदूषण की स्थिति का पूर्वानुमान लगाकर समय रहते अलर्ट जारी किए जाएंगे। चीन में वर्ष 2013 से 2025 के बीच पीएम 2.5 में 69.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जिसे प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।


परिवहन क्षेत्र में पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले बीएस-1, बीएस-2 और बीएस-3 श्रेणी के भारी वाहनों को तेजी से हटाने का प्रस्ताव है। इसके साथ 500 ई-बसों के संचालन, पांच डिपो के इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्लान पर भी काम किया जाएगा। औद्योगिक क्षेत्र में ईंट-भट्ठों, एमएसएमई क्लस्टरों और बड़े उद्योगों की परफार्मेंस ग्रेडिंग की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।


पराली और गोबर से बनेगा आर्थिक मॉडल


कृषि क्षेत्र में फसल अवशेष और गोबर को जलाने के बजाय संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दिया जाएगा। यूपी क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत प्रदेश के सभी 18 मंडलों में करीब 48 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में उर्वरक उपयोग दक्षता के पायलट प्रस्तावित हैं। गोबर से बायो-स्लरी तैयार करने और गोशालाओं के माध्यम से उसके प्रसंस्करण जैसे विकल्प अपनाए जाएंगे।


चीन के अनुभव से यह भी सीख मिली है कि प्रदूषण कम करने के लिए केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। लोगों और उद्योगों को प्रदूषण-मुक्त विकल्प उपलब्ध कराकर व्यवहार में बदलाव लाना भी जरूरी है। इसी सोच के साथ उत्तर प्रदेश में निगरानी, तकनीक, स्वच्छ परिवहन और वैकल्पिक संसाधनों को एकीकृत कर प्रदूषण नियंत्रण की नई व्यवस्था तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।