नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने आम जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए औषधि नियम, 1945 में संशोधन कर दिया है। अब छोटे गांवों (1000 से कम आबादी वाले) में बिना लाइसेंस के खांसी की सिरप बेचना अवैध हो गया है। साथ ही अब डॉक्टर की पर्ची के बिना कफ सिरप नहीं मिलेगी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राजपत्र अधिसूचना जीएसआर 927 (ई) के माध्यम से यह संशोधन अधिसूचित किया है। इस अधिसूचना के तहत औषधि नियम, 1945 की अनुसूची ‘क’ की प्रविष्टि संख्या 13 से 'सिरप' शब्द को हटा दिया गया है।
इससे पहले 1000 से कम जनसंख्या वाले गांवों में खांसी की दवा (सिरप) की बिक्री पर कुछ छूट दी गई थी। इन क्षेत्रों में खुदरा बिक्री लाइसेंस की जरूरत नहीं थी, जिसके कारण आसानी से इन दवाइयों की बिक्री हो जाती थी। अब यह छूट पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है।
संशोधन के बाद खांसी की सिरप की बिक्री और वितरण अब केवल औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 तथा औषधि नियम, 1945 के तहत लाइसेंस प्राप्त फार्मेसियों के माध्यम से ही वैध होगा। छोटे गांवों में भी अब इन दवाइयों को बिना लाइसेंस नहीं बेचा जा सकेगा।
मंत्रालय के अनुसार, यह कदम खांसी की सिरप बनाने और बेचने की प्रक्रिया पर नियामक निगरानी को मजबूत करने के लिए उठाया गया है। इससे दवाइयों के जिम्मेदार वितरण को बढ़ावा मिलेगा और पूरे देश में नियामक मानकों का बेहतर अनुपालन सुनिश्चित होगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी खांसी की दवाइयों के निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि वे नए नियमों का कड़ाई से पालन करें। किसी भी प्रकार की अनदेखी पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह संशोधन दिसंबर 2025 में अधिसूचित किया गया था और अब पूरे देश में लागू माना जाएगा।
इस कदम से ग्रामीण क्षेत्रों में भी दवाइयों की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित होगी, खासकर बच्चों को दी जाने वाली खांसी की सिरप को लेकर।
अब उपभोक्ताओं को ऐसी दवा खरीदने के लिए रजिस्टर्ड डॉक्टर के वैध प्रिस्क्रिप्शन (पर्ची) की जरूरत होगी।

