नई दिल्ली। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आने वाले दो से तीन दशकों में प्रबंधन शिक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है, क्योंकि यह उन नियमित और विश्लेषणात्मक कार्यों को स्वचालित कर रही है जिनके माध्यम से युवा पेशेवर पारंपरिक रूप से अनुभव हासिल करते रहे हैं।नोएडा में आयोजित 16वें इंडियन मैनेजमेंट कॉन्क्लेव (आईएमसी 2026) को संबोधित करते हुए नागेश्वरन ने कहा कि एआई के तेजी से विकास ने प्रबंधन शिक्षा की संरचना और उसे पढ़ाने के तरीके पर नए सिरे से सोचने का अवसर पैदा किया है।
उन्होंने कहा कि केवल एआई से जुड़े कुछ अतिरिक्त पाठ्यक्रम शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे कार्यस्थल के लिए छात्रों को तैयार करने के लिए व्यापक बदलाव की जरूरत होगी, जहां मशीनें विश्लेषणात्मक और नियमित कार्यों का बड़ा हिस्सा संभाल रही हों।
उन्होंने कहा, "सिर्फ एक एआई ऐच्छिक विषय जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रबंधन संस्थानों को छात्रों में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने पर अधिक ध्यान देना होगा।
नागेश्वरन ने कहा कि जैसे-जैसे एआई विश्लेषणात्मक कार्यों को अपने हाथ में लेगा, सही और संतुलित निर्णय लेने की क्षमता का महत्व बढ़ता जाएगा। उन्होंने कहा, "एक प्रबंधक का सबसे बड़ा उपकरण स्पष्ट और धैर्यवान दिमाग होता है। यह क्षमता छात्रों के कैंपस में पहुंचने से पहले ही चुनौती के घेरे में है। अगले 20 से 30 वर्षों में भारत के सामने यही वास्तविक चुनौतियां हैं।"
उन्होंने कहा कि एआई का सबसे बड़ा प्रभाव उन एंट्री-लेवल नौकरियों पर पड़ सकता है, जो अब तक युवा पेशेवरों के लिए सीखने और अनुभव प्राप्त करने का माध्यम रही हैं। नियमित और पहले से निर्धारित कार्य सबसे पहले स्वचालित हो रहे हैं, जिससे करियर की शुरुआती सीढ़ियां प्रभावित हो सकती हैं।
नागेश्वरन ने कहा, "समस्या यह है कि एआई अब ठीक वही जूनियर स्तर का काम कर रहा है। करियर की सीढ़ी के निचले पायदान काटे जा रहे हैं। जो नियमित कार्य युवाओं को सीखने का मौका देते थे, वही सबसे पहले स्वचालित हो रहे हैं।"
उन्होंने कहा कि दशकों से पेशेवर लोग कार्यस्थल पर अनुभव और प्रशिक्षण के जरिए धीरे-धीरे निर्णय लेने की क्षमता विकसित करते रहे हैं। यदि एआई इस सीखने की प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा समाप्त कर देता है, तो भविष्य की पीढ़ियां जटिल निर्णय लेने की क्षमता कैसे विकसित करेंगी, यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।
उन्होंने कहा, "एक सदी से हम काम करते हुए, अनुभव प्राप्त करते हुए निर्णय लेने की क्षमता सीखते आए हैं। यदि एआई उस प्रशिक्षण प्रक्रिया को खत्म कर देता है, तो अगली पीढ़ी में निर्णय लेने की क्षमता कैसे विकसित होगी?"
नागेश्वरन ने इसे प्रबंधन शिक्षा के लिए एक मूलभूत चुनौती बताते हुए कहा कि जिन कौशलों की नकल एआई आसानी से नहीं कर सकता, वही कौशल पारंपरिक कक्षा प्रणाली में सिखाना सबसे कठिन होते हैं।
उन्होंने कहा, "यह प्रबंधन शिक्षा के लिए छोटी समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी समस्या हो सकती है।" उनके अनुसार, प्रबंधन के वे पहलू जो अभी भी एआई की पहुंच से बाहर हैं, उन्हें ही सिखाना सबसे मुश्किल है।
शिक्षा की प्राथमिकताओं में बदलाव की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि प्रबंधन संस्थानों को केवल तकनीक और प्रक्रियाएं नहीं, बल्कि निर्णय क्षमता विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जैसे-जैसे एआई विश्लेषण करने में सक्षम होता जाएगा, प्रबंधकों की भूमिका यह तय करने में अधिक महत्वपूर्ण होगी कि कौन से सवाल पूछे जाएं और एआई द्वारा दिए गए जवाबों पर कितना भरोसा किया जाए।
उन्होंने कहा, "सबसे पहले निर्णय लेने की क्षमता सिखाइए, सिर्फ तकनीक नहीं।" उन्होंने सुझाव दिया कि केस स्टडीज और निर्णय-आधारित अभ्यासों के माध्यम से छात्रों में यह क्षमता विकसित की जा सकती है।




