भोपाल। मध्य प्रदेश की मोहन सरकार ने राज्य की जेलों की आबोहवा, स्वच्छता और बंदियों के रहन-सहन में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश की जेलों में बंदियों के लिए लागू करीब 58 साल पुराने नियमों को पूरी तरह बदलते हुए राज्य सरकार ने नए संशोधित नियम जारी कर दिए हैं। इसके तहत वर्ष 1968 से प्रभावी चले आ रहे 'जेल मैनुअल' में बड़ा संशोधन किया गया है। नए नियमों में जेल की टायलेट व्यवस्था, भोजन पकाने, कपड़े धोने, सजा के आधार पर कैदियों के वर्गीकरण (कैटेगराइजेशन) और जेल स्वच्छता से जुड़े कई दशकों पुराने ढर्रे को बदलकर उसे आधुनिक और मानवीय रूप दिया गया है।


इस नए जेल मैनुअल में सामाजिक समानता को बढ़ावा देने और जेलों के भीतर छुआछूत व भेदभाव को खत्म करने के लिए एक बेहद कड़ा और अनूठा प्रावधान किया गया है। नए नियमों के मुताबिक, अगर जेल में बंद कोई भी कैदी जाति, धर्म या किसी भी तरह के भेदभाव के नजरिए से जेल की टोली द्वारा बनाए गए भोजन को खाने में आपत्ति दर्ज कराता है या छुआछूत दिखाता है, तो जेल अधिकारी उस वीआईपी या रूढ़िवादी बंदी की ड्यूटी सीधे भोजन बनाने के कार्य में ही लगा देंगे। ऐसी स्थिति में उस बंदी को न केवल खुद के लिए, बल्कि जेल के सभी साथी बंदियों के लिए अनिवार्य रूप से खाना पकाना होगा। सरकार के इस सख्त कदम से जेलों के भीतर सामंती और भेदभावपूर्ण मानसिकता पर कड़ा प्रहार होगा।


सजा के आधार पर कैदियों की तय हुईं दो श्रेणियां

जेल विभाग के संशोधित नियमों के अनुसार, अब दोषसिद्ध कैदियों की मानसिक और आपराधिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए उन्हें स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा:

आदतन (आभ्यासिक) अपराधी: कोई भी ऐसा बंदी जो लगातार 5 वर्षों की अवधि में अलग-अलग मौकों पर एक या एक से अधिक अपराधों के लिए दो से अधिक बार अदालत से सजा पा चुका हो (और वह सजा अपील या पुनर्विचार में निरस्त न हुई हो), उसे 'आदतन अपराधी' माना जाएगा। हालांकि, इस 5 वर्ष की अवधि की गणना करते समय कैदी द्वारा पूर्व में जेल में बिताई गई अवधि को शामिल नहीं किया जाएगा।

गैर-आदतन (अनाभ्यासिक) अपराधी: ऐसे कैदी जो पहली बार किसी अपराध में जेल आए हैं या जो आदतन अपराधी की परिभाषा के दायरे में नहीं आते, उन्हें इस दूसरी श्रेणी में सुरक्षित रखा जाएगा।


हर सेल में टायलेट जरूरी, दिव्यांगों के लिए वेस्टर्न सीट

जेलों में स्वच्छता और मानवाधिकारों को बेहतर बनाने के लिए कारागार अधिनियम, 1894 की धारा 59 की शक्तियों का उपयोग करते हुए टायलेट व्यवस्था में बड़ा सुधार किया गया है। अब प्रदेश की जेलों के हर सेल में शौचालय होना अनिवार्य कर दिया गया है।

स्वच्छता का नया पैमाना: जेलों में अब हर 5 बंदियों पर कम से कम एक शौचालय सीट उपलब्ध कराई जाएगी, जिनमें पानी की चौबीस घंटे निरंतर सप्लाई सुनिश्चित होगी।

इसके साथ ही, बैरकों के अंदर और बाहर पर्याप्त संख्या में मूत्रालय बनाए जाएंगे। दिव्यांग बंदियों की सुविधा के लिए हर वार्ड में वेस्टर्न सीट वाले कमोड की व्यवस्था होगी और संक्रमण से बचाने के लिए हर टायलेट के बाहर हाथ धोने के लिए पानी की टंकी और साबुन रखना अनिवार्य होगा। नए नियमों में यह भी साफ किया गया है कि बंदियों की निगरानी में लगे सुरक्षाकर्मियों, प्रशासनिक स्टाफ और महिला कर्मचारियों के लिए जेल परिसर में सुरक्षित स्थानों पर पूरी तरह से अलग शौचालय बनाए जाएंगे।


पहली बार रोटी बनाने के लिए तय हुई 'एसओपी'

नए मैनुअल में कैदियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भोजन बनाने की व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए गए हैं। अब रसोई घर की भोजन टोली में केवल स्वस्थ और गैर-आदतन श्रेणी के कैदियों को ही रखा जाएगा, जिनका पहले बाकायदा स्वास्थ्य परीक्षण होगा। सुबह का नाश्ता समय पर तैयार हो सके, इसके लिए मुख्य प्रहरी की विशेष अनुमति से अल्प अवधि के दंडित बंदियों को निर्धारित समय से पहले बैरक से बाहर आने की छूट मिलेगी।


इतिहास में पहली बार जेल की रोटी को लेकर एक विस्तृत एसओपी (Standard Operating Procedure) तय की गई है। इसके अनुसार आटा तय मात्रा में लेकर पूरी तरह स्वच्छ वातावरण में गूंथा जाएगा, रोटियों की लोई समान आकार की होगी, बेलन से उन्हें गोल आकार दिया जाएगा और गर्म तवे पर उन्हें इस तरह धीरे-धीरे सेंका जाएगा जिससे वे बाहर से जलें नहीं और भीतर से कच्ची न रहें। इसके लिए अब स्वचालित रोटी मेकर उपकरणों का भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। रसोई में काम करने वाले कैदियों को कपड़े धोने या सफाई के अन्य सामान्य कामों में नहीं लगाया जाएगा।


वाशिंग मशीन से धुलेंगे कपड़े और बिस्तर

कैदियों की व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष जोर देते हुए नियम 640 में संशोधन किया गया है, जिसके तहत हर बंदी को सप्ताह में अनिवार्य रूप से नहाने और कपड़े धोने का साबुन दिया जाएगा। बंदियों के व्यक्तिगत कपड़े, कंबल और बिस्तरों की नियमित अंतराल पर गर्म पानी और डिटर्जेंट से धुलाई होगी। जेल के अस्पतालों में भर्ती बीमार बंदियों के कपड़े और बिस्तरों को आम कैदियों से अलग साफ किया जाएगा। प्रदेश की बड़ी जिला जेलों में जरूरत के अनुसार कमर्शियल स्वचालित वाशिंग मशीनें लगाई जाएंगी और गीले कपड़ों को सुखाने के लिए बैरकों के बाहर पर्याप्त शेड व स्टैंड बनाए जाएंगे।


उल्लेखनीय है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश की कुल 132 जेलों की तय क्षमता लगभग 30,000 कैदियों की है, लेकिन वर्तमान में वहां क्षमता से कहीं अधिक करीब 45,500 से 48,000 कैदी ठसाठस बंद हैं। इनमें से लगभग 50 फीसदी कैदी विचाराधीन (अंडरट्रायल) हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद मध्य प्रदेश देश का तीसरा ऐसा राज्य है जहां की जेलों में अत्यधिक ओवरक्राउडिंग (भीड़भाड़) की स्थिति है। ऐसे में राज्य सरकार का मानना है कि इन 58 साल पुराने नियमों में किए गए युगांतकारी संशोधनों से जेलों में कैदियों के जीवन स्तर, स्वास्थ्य सुरक्षा और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी, मानवीय और आधुनिक बनाया जा सकेगा।