भोपाल। मध्य प्रदेश में 19 जून को राज्यसभा की तीन महत्वपूर्ण सीटों के लिए चुनाव होने जा रहे हैं। इनमें दो सीटें भाजपा के मजबूत कब्जे में हैं, जबकि एक सीट कांग्रेस के पास है, जिस पर वर्तमान में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह राज्यसभा सांसद हैं। हालांकि दिग्विजय सिंह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे इस बार राज्यसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे और सक्रिय राजनीति में बने रहेंगे। उनके इस फैसले के बाद कांग्रेस के अंदर इस सीट के लिए कई नेताओं ने दावेदारी ठोक दी है और पार्टी इस सीट को किसी नए चेहरे, खासकर अनुसूचित जाति समुदाय से, देने की तैयारी में जुटी है।
लेकिन उम्मीदवार के नाम तय होने से पहले ही कांग्रेस के भीतर इस सीट को बचाने को लेकर गहरी चिंता छा गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को आशंका है कि क्रॉस वोटिंग का खतरा मंडरा रहा है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी के पास विधायकों की संख्या सीमित है। यदि महज 5-6 विधायक भी पार्टी लाइन से हटकर वोट डाल देते हैं, तो यह सीट हाथ से फिसल सकती है। पार्टी को डर है कि भाजपा कुछ विधायकों को अगले विधानसभा चुनाव में टिकट या अन्य राजनीतिक लालच देकर अपने पक्ष में कर सकती है।
इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि भाजपा हमेशा तोड़-फोड़ की कोशिश करती रहती है, लेकिन कांग्रेस के विधायक एकजुट और मजबूत हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि राज्यसभा की यह सीट कांग्रेस के पास ही रहेगी और पार्टी इसे बचाने में पूरी तरह सक्षम है।
गणित ऐसा है कि थोड़ी सी चूक भी भारी पड़ सकती है
मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। राज्यसभा चुनाव के लिए एक उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 58 वोटों की आवश्यकता होगी। कांग्रेस के पास वर्तमान में 65 विधायक थे, लेकिन बीना विधायक निर्मला सप्रे के भाजपा के समर्थन में चले जाने के बाद यह संख्या घटकर 64 रह गई है। इसके अलावा विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा का निर्वाचन हाईकोर्ट ने शून्य घोषित कर दिया है। यदि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिलती, तो कांग्रेस के विधायकों की संख्या और घटकर 63 रह सकती है। ऐसे में क्रॉस वोटिंग का खतरा और भी गंभीर हो जाता है।
पिछले उदाहरण भी चिंता बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मध्य प्रदेश के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर क्रॉस वोटिंग की थी, जिससे विपक्ष को करारा झटका लगा था। 2020 के राज्यसभा चुनाव में जब तीन सीटों पर मतदान हुआ था, तब प्रभावी विधायक 206 थे और जीत के लिए 52 वोट चाहिए थे। उस समय दिग्विजय सिंह को 57 वोट मिले थे और वे सफल रहे थे। लेकिन अब बदलते गणित और कमजोर संख्याबल के कारण कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना है। यदि क्रॉस वोटिंग हुई, तो दिग्विजय सिंह वाली यह ऐतिहासिक सीट कांग्रेस के हाथ से निकल सकती है। पार्टी अब हर विधायक पर कड़ी नजर रख रही है ताकि कोई अनहोनी न हो।

