भोपाल। मध्य प्रदेश के डेढ़ लाख से अधिक शिक्षकों में तब हड़कंप मच गया, जब सोशल मीडिया पर एक कथित आदेश वायरल हुआ, जिसमें लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों के लिए फिर से शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य करने की बात कही गई। हालांकि शिक्षक संगठनों ने इस वायरल दस्तावेज को फर्जी करार दिया है, लेकिन शिक्षा विभाग से जुड़े आधिकारिक आदेश की पुष्टि हो रही है, जो सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के फैसले पर आधारित है।
वायरल आदेश में 2 मार्च को जारी बताए गए दस्तावेज का हवाला देकर प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के शिक्षकों के साथ-साथ शिक्षाकर्मी वर्ग-1 से अध्यापक बने शिक्षकों को भी TET परीक्षा में शामिल होने की बात कही गई है। इसमें 1998 के बाद नियुक्त वर्ग-1, 2 और 3 के शिक्षाकर्मियों तथा 2001, 2003, 2005, 2008, 2011 और 2013-14 तक नियुक्त संविदा शिक्षकों को परीक्षा अनिवार्य बताई गई। आदेश में 1 अप्रैल से MP Online के माध्यम से आवेदन भरने और स्कूलों को 25 मार्च तक शिक्षकों की जानकारी सत्यापित करने का उल्लेख है।
वायरल दस्तावेज पर सवाल उठे हैं, क्योंकि पहले पेज पर किसी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं, जबकि दूसरे पेज पर अपर संचालक के हस्ताक्षर बताए गए हैं। साथ ही दो पेज के पत्र में दो बार प्रतिलिपि दर्शाई गई है, जिससे इसकी प्रमाणिकता संदिग्ध लग रही है। लोक शिक्षण आयुक्त शिल्पा गुप्ता और संचालक स्कूल शिक्षा केके द्विवेदी सहित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिशों के बावजूद कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी।
शासकीय शिक्षक संगठन के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कौशल और मप्र अध्यापक-शिक्षक संघ अध्यक्ष भरत पटेल ने कहा कि ऐसे फर्जी या भ्रामक आदेशों से शिक्षकों में भय और आक्रोश फैल रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि मामले की जांच कराई जाए और स्पष्ट किया जाए कि क्या वाकई ऐसी परीक्षा प्रस्तावित है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि आवश्यक हुआ तो उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की जाएगी।
हालांकि शिक्षा विभाग के लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) द्वारा जारी आधिकारिक निर्देशों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर RTE एक्ट 2009 से पहले नियुक्त शिक्षकों (जिनकी सेवानिवृत्ति में 5 साल से अधिक समय बचा है) को दो वर्ष के भीतर TET पास करने अनिवार्य बताया गया है। फेल होने पर सेवा से हटाने या अनिवार्य सेवानिवृत्ति का प्रावधान है। परीक्षा जुलाई-अगस्त 2026 में प्रस्तावित है।
शिक्षकों का कहना है कि 20-30 साल की सेवा के बाद अचानक यह शर्त लगाना अनुचित है और इससे उनके भविष्य पर संकट मंडरा रहा है। प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं, जिसमें भोपाल में कलेक्ट्रेट पर ज्ञापन सौंपा गया है।

