भोपाल, पंकज यादव। सड़क निर्माण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मध्य प्रदेश देश के सामने एक अनूठा और क्रांतिकारी मॉडल पेश करने जा रहा है। अब प्रदेश में कंक्रीट की मजबूत और टिकाऊ सड़कें बनाने के लिए पारंपरिक पोर्टलैंड सीमेंट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। राजधानी भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित 'राज्य स्तरीय अभियंता दिवस समारोह' के दौरान मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) और सीएसआईआर-एम्प्री (CSIR-AMPRI, भोपाल) के बीच एक ऐतिहासिक एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह की मौजूदगी में हुए इस समझौते के तहत राज्य में पहली बार बड़े पैमाने पर फ्लाई ऐश आधारित और बिना सीमेंट वाली कंक्रीट सड़कों के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है।
क्या है यह तकनीक और कैसे बनेगी सड़क?
सिविल इंजीनियरिंग और मटीरियल साइंस में इस तकनीक को मुख्य रूप से 'जियोपॉलीमर कंक्रीट' के रूप में जाना जाता है। पारंपरिक कंक्रीट में गिट्टी और रेत को आपस में बांधने का काम सीमेंट करता है, जिसे बनाने में भारी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता है। नए फॉर्मूले के तहत सीमेंट की जगह थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाली राख (फ्लाई ऐश) और औद्योगिक अपशिष्ट जैसे स्लैग का उपयोग किया जाता है। फ्लाई ऐश में मौजूद सिलिका और एल्युमिना को जब खास क्षारीय एक्टिवेटर (Alkaline Activator) के साथ मिलाया जाता है, तो रासायनिक प्रतिक्रिया से एक बेहद मजबूत त्रि-आयामी पॉलीमेरिक बॉन्ड तैयार होता है। यह बाइंडिंग पारंपरिक सीमेंट की तुलना में उतनी ही या उससे भी अधिक मजबूती प्रदान करती है। भोपाल स्थित सीएसआईआर-एम्प्री ने वर्षों के गहन अनुसंधान के बाद इस फॉर्मूले को सड़क निर्माण के व्यावहारिक मानकों पर खरा उतारा है।
पर्यावरण सुरक्षा और वेस्ट-टू-वेल्थ का अनूठा संगम
सीमेंट उद्योग दुनिया भर में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोतों में गिना जाता है, जहां एक टन सीमेंट के उत्पादन में लगभग 800 से 900 किलोग्राम ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। बिना सीमेंट वाली तकनीक अपनाने से सड़क निर्माण में होने वाले कार्बन फुटप्रिंट में 70 से 80 प्रतिशत तक की कमी आएगी। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश के बिजली संयंत्रों से निकलने वाली लाखों टन फ्लाई ऐश का सुरक्षित और बड़े पैमाने पर निस्तारण संभव हो सकेगा, जो अब तक पर्यावरण और कृषि भूमि के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। पारंपरिक कंक्रीट सड़कों की तुलना में इस प्रक्रिया में तराई (Curing) के लिए पानी की खपत भी बेहद कम होती है, जिससे बहुमूल्य जल संसाधनों की भी बचत होगी।
मौसम और भारी ट्रैफिक के बीच लंबी उम्र
जियोपॉलीमर कंक्रीट से बनने वाली सड़कें तकनीकी दृष्टिकोण से भी अधिक टिकाऊ साबित होती हैं। यह सामग्री सल्फेट, एसिड और रासायनिक क्षरण के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है, जिसके चलते भारी बारिश और जलभराव वाले इलाकों में भी सड़कों के जल्दी टूटने या गड्ढे पड़ने का जोखिम नहीं रहता। इसके अलावा, तापमान के अत्यधिक उतार-चढ़ाव में भी इसमें दरारें पड़ने की संभावना न्यूनतम रहती है। उच्च कंप्रेसिव और फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ के कारण यह भारी व्यावसायिक वाहनों और भारी ट्रैफिक लोड को लंबे समय तक आसानी से सहन करने की क्षमता रखती है।
पायलट प्रोजेक्ट से मुख्यधारा तक का सफर
सहमति पत्र के अनुसार, लोक निर्माण विभाग और सीएसआईआर-एम्प्री पहले चरण में प्रदेश के चुनिंदा हिस्सों में पायलट स्ट्रेच तैयार करेंगे। इन प्रायोगिक खंडों पर स्थानीय जलवायु, मानसूनी परिस्थितियों और वास्तविक ट्रैफिक दबाव के आधार पर कंक्रीट के व्यवहार का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। फील्ड टेस्टिंग और मानक तय होने के बाद इस तकनीक को राज्य के प्रमुख राजमार्गों, एक्सप्रेसवे और जिला मार्गों के आगामी प्रोजेक्ट्स में नियमित निर्माण फॉर्मूले के रूप में लागू किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस पहल को ऐतिहासिक बताते हुए विश्वास जताया कि आधुनिक विज्ञान और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का यह मेल मध्य प्रदेश के साथ-साथ पूरे देश के ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मील का पत्थर साबित होगा।














