Monday, January 19, 2026

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मध्य प्रदेशसतनाबांस से बदली किस्मत, सतना के स्वयं सहायता समूह ने बनाए प्रीमियम उत्पाद, विदेशों तक पहुंची पहचान

बांस से बदली किस्मत, सतना के स्वयं सहायता समूह ने बनाए प्रीमियम उत्पाद, विदेशों तक पहुंची पहचान

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19 जनवरी 2026, 12:29 pm IST
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सतना। जिस बांस को कभी ग्रामीण इलाकों में टोकरी, मचिया और घरेलू उपयोग तक सीमित माना जाता था, वही आज लग्जरी और डिजाइनर उत्पादों के रूप में अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बना रहा है। मध्य प्रदेश के सतना जिले के सोनौरा स्थित वन विश्राम गृह परिसर में संचालित नर्मदा स्वयं सहायता समूह और उससे जुड़ी यूनिट ने बांस को साधारण कच्चे माल से निकालकर ग्लोबल ब्रांड का रूप दे दिया है।

इस पहल की शुरुआत बैंबू मिशन के तहत हुई, जब मिशन के डायरेक्टर के सुझाव पर एक आईआईटियन ने बांस आधारित बिजनेस आइडिया पर काम शुरू किया। पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक डिजाइन के मेल से तैयार किए गए उत्पाद आज न सिर्फ देश में बल्कि दुबई, मलेशिया, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका तक निर्यात किए जा रहे हैं। कई देशों में कंपनी के नियमित ग्राहक भी तैयार हो चुके हैं।

इस यूनिट में बांस से बने 50 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें डिजाइनर लैंप, कुर्सी, सोफा, डाइनिंग टेबल, स्टूल, ट्रे, टोकरी, पेन होल्डर शामिल हैं। पहली नजर में ये उत्पाद महंगी लकड़ी या धातु के प्रतीत होते हैं, जबकि ये पूरी तरह बांस से निर्मित होते हैं। इनकी कीमत 2500 रुपये से शुरू होकर लाखों रुपये तक है।

यूनिट की खास पहचान बांस से बनी डिजिटल ई-साइकिल भी है। यह ई-साइकिल बैटरी सिस्टम और आईओटी तकनीक से लैस है, जो कुछ घंटों के चार्ज में 25 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से एक बार में लगभग 100 किमी तक चल सकती है। बांस से बना इसका फ्रेम हल्का होने के साथ-साथ स्टील जितना मजबूत है। 75 से 80 हजार रुपये कीमत वाली इस ई-साइकिल के ऑर्डर भी मिलने लगे हैं।

नर्मदा स्वयं सहायता समूह के अध्यक्ष पुष्पराज वरुण ने बताया कि बांस को आधुनिक मशीनों से प्रोसेस किया जाता है। कटिंग, नोड फिनिशिंग, स्प्लिटर, मल्टीपरपज और फोर-साइड प्लेनर मशीनों के माध्यम से बांस को तैयार कर कुशल कारीगरों द्वारा आकर्षक उत्पाद बनाए जाते हैं। सभी उत्पादों का डिजाइन दिल्ली में कंपनी के ओनर और आईआईटियन शशांक गौतम द्वारा तैयार किया जाता है।

इस यूनिट से 30 से 35 स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिला है, जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। बिरसिंहपुर, मझगवां और कुआं गांव के कारीगर अपनी पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन से जोड़कर नई पहचान बना रहे हैं। कई आदिवासी महिलाएं वर्क फ्रॉम होम के माध्यम से बांस उत्पाद तैयार कर रही हैं।

बांस की आपूर्ति जिले के हाटी क्षेत्र के साथ-साथ असम से भी की जाती है। अब तक यूनिट को अदानी एयरपोर्ट प्रोजेक्ट सहित कई बड़े प्रोजेक्ट्स के ऑर्डर मिल चुके हैं। यह पहल न केवल बांस उद्योग को नई दिशा दे रही है, बल्कि ग्रामीण रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण का भी सशक्त उदाहरण बनकर सामने आई है।

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