आतंकियों के अहंकार से जीवन पर संकट

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अहंकार, तृष्णा और लालच का कोई अन्त नहीं होता। यह वे शत्रु हैं जो समूल का नाश कर देते हैं। गीता का यह वाक्य वर्तमान में संसार की गतिविधियों की व्याख्या के लिए सर्वोचित है। संसार का सम्राट बनने की लालसा ने ट्रंप को मोहम्मद तुगलक की तरह पागल बादशाह बना दिया है। दूरगामी परिणामों की समीक्षा किये बिना ईरान पर थोपे गये युद्ध ने तीसरे विश्वयुद्ध की शंखनाद कर दिया है। कट्टरता पर आधारित आतंक से गजवा-ए-दुनिया का लक्ष्यभेदन करने के मंसूबे पालने वालों में ईरान भी एक प्रमुख देश है। ऐसे देशों की एक लम्बी फेहरिश्त है जो मजहब के नाम पर अंधविश्वास परोस रहे हैं। बहत्तर हूरों से लेकर सजील जवानों की भीड के ख्वाब दिखाने वाले खुद के कुनबे को सुरक्षित स्थानों पर रखकर पूरे सम्प्रदाय को आग में झौंकने में लगे हैं। वहीं अमेरिका भी अपनी बादशाहत तले संसार को लाना चाहता है। एक ओर तो कट्टरता का आतंक है तो दूसरी ओर चौधराहट से भय पैदा करने वाला। दौनों ही अपनी अमानवीय प्रकृति से सृष्टि का नाश करने पर तुले हैं। युद्ध में सिद्धान्तों, मर्यादाओं और आदर्शों की खुलकर होली जलाई जा रही है। जहां अमेरिका की मनमानियां दूसरे देश के मेहमान बनकर आये काफिले को नष्ट करने में लगीं हैं वहीं सजातीय लोगों की आबादी पर दुश्मन का दोस्त होने का गुस्सा फूट रहा है। ईमानदाराना बात तो यह है कि आतंकियों के अहंकार से जीवन पर संकट के बादल मडरा रहे हैं। एक ओर मजहबी फतवों का आतंक हैं तो दूसरी ओर गुण्डागिरी की इबारत का खौफ। चारों ओर असुरक्षा का वातावरण निर्मित हो चुका है। अमेरिका ने भारत के युद्धाभ्यास में शामिल होने आये ईरानी युद्धपोत को हिन्द महासागर में डुबोकर भारत को भी अप्रत्यक्ष में संग्राम में आमंत्रण दे डाला है वहीं ईरान भी खाडी देशों में विस्फोट करके उन्हें जवाबी कार्यवाही के लिए उकसा रहा है। हथियार, भितरघातियों और आतंक की दम पर अमेरिका ने अपनी पहुंच दुनिया के लगभग सभी देशों में बना रखी है वहीं ईरान का कट्टरता भरा पैगाम सजातीय लोगों को फिदायनी बनाने में लगा है। उसने अनेक आतंकी संगठनों को पैदा किया है, उन्हें पाला है और अब खुला संरक्षण भी दे रहा है। मीरजाफरों की फौजों का दोगलापन राष्ट्रभक्तों की हत्यों का कारण बनता जा रहा है। खद्दरधारियों के गिरोहों से लेकर स्वयं भू बुद्धिजीवियों की जमातों तक के क्रिया-कलाप से उनके विदेशी आकाओं की हुक्मपरस्ती का संदेश मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ का औचित्यविहीन होता स्वरूप, रूस-चीन जैसे देशों की खामोशी और षडयंत्रकारियों का युद्ध विस्तार हेतु प्रयास अब किसी भी रूप में सुखद नहीं कहा जा सकता। सन् 2026 से 2027 तक के कालखण्ड को अनेक भविष्य वक्ताओं ने समूचे संसार के लिए बेहद खतरनाक बताया था। मनमानी जनसंख्या वृद्धि, कट्टरता पर बढता अंधविश्वास और पुरातन सामाजिक व्यवस्था को रूढियों की तरह स्वीकारने के कारण दुनिया भर में अशान्ति का वातावरण पहले से ही निर्मित हो चुका है। भूमि के अनुपात में जनसंख्या का संतुलन पूरी तरह बिगड चुका है। आने वाले समय में खाद्यान्न से लेकर पेयजल तक की विकराल समस्या पैदा होने वाली है। वर्चस्व के अहंकार ने हथियारों के जखीरों की भारी खेपें तैयार कर लीं हैं। बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया आज भी ख्वाबों में जी रही है। मजहबी तालीम देने वाले लोग अब कट्टरता का पाठ पढाकर विलासता भरा जीवन जी रहे हैं। उन्हें आसमान से उतरी किताबों के वास्तविक संदेशों तक पहुंचने के लिए खुद को इबादत के रूहानी रास्ते पर चलना पडेगा जहां केवल और केवल एक महाशक्ति के लिए ही उत्तरदायी माना जायेगा, सभी को एक नजर से देखना पडेगा, सभी को उसी एक महाशक्ति की औलाद मानना पडेगा। जब तक यह नहीं होगा तब तक आरोपों पर प्रत्यारोपों की बौछारें होती रहेंगीं, बेगुनाहों का खून बहता रहेगा और होती रहेंगी सियासी जंग। इतिहास गवाह है कि जंग के माहौल में भी भारत ने अपने नागरिकों की हमेशा ही सुरक्षित वापिसी कराई है। तलवारें खींचने वाले सभी देशों ने भारतीय लोगों के लिए गलियारा दिया। पडोसी दुश्मन देशों के नागरिकों ने भी भारतीयता का छद्मभेष धारण करके अपने को बचाया। सत्ता के विरोध में बैठने का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि राष्ट्र के सभी हितकारी कार्यों, परियोजनाओं और महात्वाकाक्षांओं का अशोभनीय, अमर्यादित और असंवैधानिक विरोध किया जाये। ऐसी हरकतों ने हमेशा ही संविधान, सदन और सम्मान को पतन के गर्त में पहुंचाया है। राजनैतिक दलों ने अब जिस तेजी से आरोपियों, अपराधियों और आतंकियों को चुनावी जंग में जीतने हेतु प्रत्याशी बनाना शुरू कर दिया है, उससे सदन में पहुंचकर वहां भी गैंगवार जैसी स्थिति ही निर्मित हो रही है। उनके नेता अपने गिरोह के सदस्य को खुला संरक्षण दे रहे हैं। यह रोग केवल भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि कोरोना की तरह समूचे संसार में फैल चुका है। उसी का परिणाम है कि चारों ओर आतंक, भय और असुरक्षा का माहौल निरंतर विस्तार पा रहा है। ऐसे में केवल और केवल आसमान से उतरी किताबों और पैगम्बरों के शब्दों का वास्तविक अर्थ समझने-समझाने की आवश्यकता है। सबका मालिक एक, परमात्मा एक है, शरीर नश्वर है, संसार एक मेहमानखाना है, साथ में कुछ नहीं जायेगा, भाग्य से ज्यादा और वक्त से पहले कुछ नहीं मिलता जैसे आदर्श वाक्यों को दिल में बैठाने के बाद कोई भी व्यक्ति किसी को भी शत्रुता भरी नजरों से नहीं देख सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
