Wednesday, January 14, 2026

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फाइटर जेट को नागरिक विमान बनाकर हमला करने को अमेरिका बता रहा ‘सीक्रेट मिशन’

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14 जनवरी 2026, 10:09 am IST
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मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्ध नियमों का सबसे बड़ा पैरोकार बनने वाला अमेरिका अपने ही दावों के उलट खड़ा नजर आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी सेना की उस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसमें सितंबर 2025 में कैरेबियन सागर में एक सैन्य हमले को अंजाम देने के लिए फाइटर जेट को नागरिक विमान जैसा रूप दिया गया, जिस कृत्य को अमेरिका रूस जैसे देशों के लिए ‘युद्ध अपराध’ बताता है, वही काम खुद करने पर उसे ‘सीक्रेट मिशन’ करार दिया जा रहा है।


रिपोर्ट के मुताबिक 2 सितंबर 2025 को अमेरिकी सेना ने एक संदिग्ध नाव पर हमला किया। हमला करने वाला विमान बाहर से पूरी तरह सिविल प्लेन जैसा दिख रहा था। हथियार पंखों के नीचे नहीं बल्कि विमान के अंदर छिपाकर रखे गए थे, ताकि उसकी सैन्य पहचान सामने न आए। अंतरराष्ट्रीय कानून में इस तरह की धोखाधड़ी को ‘परफिडी’ कहा जाता है, यानी खुद को नागरिक बताकर दुश्मन को भ्रमित करना और उस पर हमला करना। यह न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून बल्कि अमेरिकी सैन्य कानून के तहत भी अपराध माना जाता है।


रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पहली स्ट्राइक के बाद समुद्र में बचे दो निहत्थे नाविकों पर दोबारा हमला किया गया, जिससे उनकी मौत हो गई। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के मुताबिक विमान से बचे निहत्थे लोगों पर हमला करना स्पष्ट युद्ध अपराध है। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई को ड्रग्स के खिलाफ अभियान बताते हुए मारे गए लोगों को ‘नार्को-टेररिस्ट’ बताया, लेकिन अब तक न तो इसका ठोस सबूत दिया गया और न ही साफ किया कि मारे गए 123 लोग कौन थे।


अमेरिकी वायुसेना के पूर्व वरिष्ठ कानूनी अधिकारी के मुताबिक सैन्य पहचान छिपाकर हमला करना सीधे तौर पर युद्ध अपराध है। खुद अमेरिकी वॉर हैंडबुक भी कहती है कि सैन्य अभियानों में नागरिक और सैन्य साधनों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना कमांडरों की जिम्मेदारी है। सबसे बड़ा सवाल अमेरिका के दोहरे मापदंडों पर उठता है। रूस या किसी अन्य देश द्वारा ऐसे किसी कदम को तुरंत अंतरराष्ट्रीय अपराध बताया जाता है, प्रतिबंध लगाए जाते हैं और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन जब वही तरीका अमेरिका अपनाता है, तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा का नाम दे दिया जाता है। नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था का दावा करने वाले अमेरिका के लिए यह मामला उसकी विश्वसनीयता पर गहरा दाग बनकर उभरा है।

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