मध्य प्रदेश के 395 नगर निकायों में अध्यक्षों की कुर्सी पर मंडरा रहा बड़ा संकट...!

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भोपाल। मध्य प्रदेश में नगर पालिका और नगर परिषदों के सैकड़ों अध्यक्षों के लिए मुसीबतें बढ़ गई हैं। 2022 के निकाय चुनावों में पार्षदों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए इन अध्यक्षों का कोई आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन राज्य सरकार ने जारी नहीं किया था। अब इस तकनीकी खामी के चलते उनके वित्तीय अधिकार शून्य हो रहे हैं, जिससे विकास कार्य ठप होने का खतरा मंडरा रहा है।
अब तक दो प्रमुख मामलों में कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। इंदौर जिले की पानसेमल नगर परिषद और श्योपुर नगर पालिका के अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार पूरी तरह शून्य घोषित कर दिए गए हैं। श्योपुर मामले में हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी, जिससे अध्यक्ष रेणु गर्ग को काम करने से रोक लग गई। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना गजट अधिसूचना के कोई व्यक्ति विधिवत निर्वाचित नहीं माना जा सकता।
इसी तरह ग्वालियर जिले की डबरा नगर पालिका अध्यक्ष लक्ष्मी बाई के मामले में हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर उनकी नियुक्ति का आधार तलब किया है। एक RTI के जवाब में खुद नगर पालिका ने स्वीकार किया कि उनके रिकॉर्ड में कोई अधिसूचना नहीं है। अब याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर पद की वैधानिकता पर सवाल उठाए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। प्रदेश में कुल 99 नगर पालिकाओं और 298 नगर परिषदों (कुल 397, लेकिन कुछ स्रोतों में 395 बताए जा रहे हैं) में से अधिकांश अध्यक्ष इसी अप्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया से चुने गए थे। जैसे-जैसे विरोधी पार्षद या याचिकाकर्ता कोर्ट पहुंचेंगे, वित्तीय अधिकार शून्य होने के फैसले बढ़ते जाएंगे।
यह पूरा विवाद 2022 के निकाय चुनावों से जुड़ा है, जब ओबीसी आरक्षण के सुप्रीम कोर्ट केस के बाद जल्दबाजी में चुनाव कराए गए। नगर निगमों में महापौर का चुनाव तो सीधे जनता से हुआ और उनका नोटिफिकेशन भी जारी हुआ, लेकिन नगर पालिका-परिषद अध्यक्षों को पार्षदों ने चुना और सरकार ने नोटिफिकेशन जारी नहीं किया। नगरीय विकास विभाग के अफसरों ने भी माना कि यह शासन का फैसला था, लेकिन अब इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
हालांकि अच्छी खबर यह है कि सितंबर 2025 में कानून संशोधित कर आगामी 2027 के चुनावों में नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्ष का चुनाव फिर से प्रत्यक्ष (जनता द्वारा सीधे) कराने का प्रावधान कर दिया गया है। तब नोटिफिकेशन भी जारी होगा। लेकिन फिलहाल मौजूदा 2022 बैच के अध्यक्षों के लिए खतरा बरकरार है। विरोधी पक्ष अब तेजी से कोर्ट का रुख कर रहा है, जिससे सैकड़ों निकायों में प्रशासनिक संकट गहरा सकता है।
