भोपाल। मध्य-पूर्व में छिड़े युद्ध की आग अब आपकी दवाइयों की डिब्बी तक पहुँचने वाली है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मचे इस कोहराम ने फार्मास्यूटिकल सेक्टर की कमर तोड़ दी है, जिससे आने वाले दिनों में सर्दी-खांसी से लेकर गंभीर बीमारियों की दवाइयां महंगी होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। कच्चे माल और ट्रांसपोर्टेशन के खर्च में आई भारी उछाल ने दवा कंपनियों को मजबूर कर दिया है कि वे सरकार के सामने कीमतों में बढ़ोत्तरी की गुहार लगाएं।
विशेषज्ञों की मानें तो यह संकट केवल सीमा पार का युद्ध नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब पर सीधा हमला है। पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाले सॉल्वेंट्स की कीमतों में महज एक हफ्ते के भीतर 20 से 30 प्रतिशत की तेजी आई है। सबसे चौंकाने वाले आंकड़े कच्चे माल के हैं, जहाँ ग्लिसरीन जैसी बुनियादी चीज की कीमत दिसंबर से अब तक 64% तक उछल चुकी है, वहीं घर-घर में इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामोल के दाम भी 26% बढ़ गए हैं। शिपिंग रूट प्रभावित होने और तेल की आपूर्ति में बाधा आने से पूरी सप्लाई चेन चरमरा गई है।
मध्य प्रदेश ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के सचिव अजय सिंह ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि आवश्यक दवाइयों की कीमतें सरकार के नियंत्रण में होती हैं, ऐसे में बढ़ती लागत का बोझ उठाना अब कंपनियों के बस से बाहर हो रहा है। यही वजह है कि दवा संगठनों ने 'नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी' (NPPA) से नियमों में ढील देकर कीमतों में अस्थायी संशोधन की मांग की है। कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो जाएगा।
इस संकट का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ओमान जैसे देश जो भारतीय जेनेरिक दवाओं के बड़े खरीदार हैं, वहां भी हड़कंप मच सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख और घरेलू बाजार में दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए एमएसएमई निर्यातकों ने अब सरकार से 'फ्रेट सब्सिडी' (परिवहन सब्सिडी) की मांग तेज कर दी है। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचा, तो दवाइयों की किल्लत और बढ़ते दाम आम जनता के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।



