एक कमरे में परिवार, दूसरे में 'भविष्य' की पाठशाला; 14 साल से अपना घर दान कर शिक्षा की अलख जगा रहा यह ग्रामीण

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सतना, अंबिका केशरी। मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर किए जा रहे सरकारी दावों के बीच सतना जिले के उचवा टोला से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो व्यवस्था को आईना भी दिखाती है और मानवता का सिर गर्व से ऊँचा भी करती है। यहाँ के निवासी रामसज्जन मल्लाह पिछले 14 वर्षों से अपने दो कमरों के मकान का आधा हिस्सा (एक कमरा) शासकीय प्राथमिक शाला के संचालन के लिए नि:शुल्क दे रखा है।
दो कमरों में सिमटी दुनिया और सपने रामसज्जन के पास रहने के लिए मात्र दो छोटे कमरे हैं। एक कमरे में वे अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ गुजर-बसर करते हैं, जबकि दूसरा कमरा उन्होंने गांव के बच्चों की पढ़ाई के लिए समर्पित कर दिया है। साल 2010 से ही यहाँ कक्षा 1 से 5 तक के 23 बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि स्कूल की छुट्टी होने के बाद ही रामसज्जन का परिवार उस कमरे का उपयोग कर पाता है।
3 किमी पैदल चलने का दर्द बना प्रेरणा रामसज्जन ने बताया कि बचपन में उन्हें पढ़ने के लिए 3 किलोमीटर दूर तिघरा जाना पड़ता था। बारिश और तपती धूप की तकलीफ झेलते हुए उन्होंने संकल्प लिया था कि गांव के बच्चों को यह कष्ट नहीं होने देंगे। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने घर के द्वार स्कूल के लिए खोल दिए।
नेताओं के खोखले वादे और 14 साल का इंतजार रामसज्जन का संघर्ष किसी तपस्या से कम नहीं रहा। वे अपनी मांग लेकर भोपाल में पूर्व शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनिस से मिले, तीन दिन वहां डेरा डाला। आश्वासन मिला, स्थानीय विधायक ने फीता भी काटा और दो महीने में भवन बनवाने का दावा किया, लेकिन वह 'दो महीना' 14 साल में बदल गया।
अब जागी प्रशासन की नींद देर से ही सही, लेकिन अब प्रशासन की नींद टूटी है। जिला पंचायत सीईओ की टीम ने मौके का मुआयना किया और रामसज्जन के त्याग को देखकर दंग रह गई।
कलेक्टर सतीश कुमार एस ने कहा, "रामसज्जन मल्लाह का कार्य सम्मान के योग्य है। प्रशासन ने उन्हें सम्मानित किया है और खुशी की बात यह है कि स्कूल भवन अब सैंक्शन हो गया है। अगले 10 दिनों के भीतर स्कूल का निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा।"
