- डॉ रजनी प्रधान
बुंदेलखंड की पावन धरा पर स्थित 'श्री बागेश्वर धाम', जो वर्तमान में संपूर्ण विश्व के लिए सनातन एकता और अटूट श्रद्धा का जाज्वल्यमान केंद्र बन चुका है, हाल ही में एक ऐतिहासिक घटना का साक्षी बना। यहाँ उत्तर की हिमालय-सी अडिग आस्था की भक्ति-धारा और दक्षिण के सागर जैसी गंभीर प्रज्ञा की ज्ञान-धारा का अनुपम संगम हुआ। एक ओर सनातन एकता के देदीप्यमान-तेजस्वी उद्घोषक, 'श्री बागेश्वर धाम' के पीठाधीश्वर पं. श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्रीजी की ओजपूर्ण उपस्थिति थी, तो दूसरी ओर विश्व-चेतना को अपनी आध्यात्मिक रश्मियों से आलोकित करने वाले आधुनिक युग के योगशिरोमणि पद्मविभूषण सद्गुरु श्री जग्गी वासुदेवजी का गरिमामय आगमन। पं. श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्रीजी ने अपनी चिर-परिचित आत्मीयता और विनम्रता के साथ उनका अभिनंदन किया।
श्री सद्गुरुजी, जिनका जीवन स्वयं में एक महागाथा है, केवल एक संत नहीं बल्कि आधुनिक युग के पर्यावरण ऋषि हैं। कोयंबटूर की धरा पर 'ईशा फाउंडेशन' के रूप में मानवता के कल्याण का केंद्र स्थापित करने वाले श्री सद्गुरुजी ने 'इनर इंजीनियरिंग' जैसे सूत्रों से वैश्विक मानस (Worldly Mind) को आंतरिक आनंद (Inner Peace) की कला सिखाई। जब वे बागेश्वर धाम की चौखट पर पधारे, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो 'सेव सॉयल' और 'कावेरी कॉलिंग' जैसे महान अभियानों की तपस्या, इस पवित्र धाम की मिट्टी को नमन करने आई हो।
अध्यात्म के आकाश में कुछ नक्षत्र ऐसे होते हैं जो अपनी निश्चित कक्षा में ही भ्रमण करते हैं, परंतु जब वे अप्रत्याशित रूप से मिलते हैं, तो इतिहास रच जाता है। योगमार्गी श्री सद्गुरुजी को प्रायः पारंपरिक मठ-मंदिरों की देहरी पर विरले ही देखा गया है। उनकी साधना का केंद्र सूक्ष्म चेतना और अंतर्मन की 'इंजीनियरिंग' रहा है। किंतु, नियति ने खजुराहो की पावन धरा के समीप, चंद्रनगर के एकांत को उनकी ध्यान-स्थली के रूप में चुना। यह एक अद्भुत संयोग ही था कि आधुनिक विश्व को योग का सूत्र देने वाले श्री सद्गुरुजी, सनातन आस्था के प्रखर केंद्र 'श्री बागेश्वर धाम' की छाया में थे। इस यात्रा में वे अकेले नहीं थे; उनके साथ 40 राष्ट्रों के वे 140 जिज्ञासु साधक भी थे, जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर केवल शांति की खोज में भारत आए थे।
यज्ञ की आहुति: विश्व-कल्याण का संकल्प लिए श्री सद्गुरुजी और उनके विदेशी शिष्यों ने यज्ञशाला की प्रज्वलित अग्नि में समिधाएँ अर्पित कीं।
देव दर्शन: उन्होंने श्री बागेश्वर महादेव और श्री बागेश्वर बालाजी के तेज का दर्शन कर अपनी श्रद्धा निवेदित की।
तपोभूमि को नमन: सिद्धों की तपोस्थली श्री संन्यासी बाबा की समाधि पर उन्होंने अपना शीश नवाया और उस 'बाधाहरण वृक्ष' का स्पर्श किया, जो श्री प्रेतराज सरकार की असीम कृपा और जन-मानस के दुखों के निवारण का जीवंत साक्षी है।
श्री बागेश्वर धाम सरकार ने श्री सद्गुरुजी को उस महान तपस्वी के पुरुषार्थ से परिचित कराया, जिनकी ऊर्जा आज भी 'श्री बागेश्वर धाम' के कण-कण में प्रवाहित है। आज से लगभग 325 वर्ष पूर्व, श्री संन्यासी बाबा ने कठोर साधना का मार्ग चुना था; उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर, अविचल भाव से हनुमान चालीसा के सवा करोड़ पाठ पूर्ण किए। अपनी आयु के 84 वसंत उन्होंने इसी एकाग्र तपस्या में व्यतीत कर दिए और अंततः जीवंत समाधि लेकर स्वयं को परम तत्त्व में विलीन कर लिया।
दोनों महान संत उस पावन समाधि स्थल पर पहुँचे। वहाँ लगभग 20 मिनट तक दोनों विभूतियों ने मौन रहकर ध्यान लगाया। वह दृश्य अद्भुत था—एक ओर सनातन की प्राचीन तपोनिष्ठ परंपरा के भक्तिमार्गी संवाहक और दूसरी ओर आधुनिक विश्व को योग मार्ग दिखाने वाले ज्ञानमार्गी पथप्रदर्शक; दोनों महातपस्वी श्री संन्यासी बाबा की ऊर्जा से एकाकार हो रहे थे। यह दृश्य मौन और मुखर के बीच एक सेतु जैसा था, जहाँ शब्द शांत थे और चेतना मुखर।
'मातृ देवो भव'—साधना के उस क्षण के उपरांत, सद्गुरु ने पीठाधीश्वर महाराज की पूजनीया माताजी के चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके पश्चात:
चिंतन-मनन: दोनों संतों के मध्य लगभग 20 मिनट तक एकांत में अध्यात्म के सूक्ष्म रहस्यों और लोक-कल्याण के विषयों पर गहन चर्चा हुई।
संकल्पों की सराहना: सद्गुरु, जो स्वयं विश्व-कल्याण के स्वप्नदृष्टा हैं, उन्होंने धाम के सेवा प्रकल्पों और सनातन धर्म के प्रति महाराज जी के संकल्पों की मुक्त कंठ से सराहना की।
संन्यासी बाबा की तपस्या के आलोक में हुआ यह चिंतन निश्चित ही भविष्य में आध्यात्मिक जागृति का एक नया अध्याय लिखेगा। श्री सद्गुरुजी ने अपनी सहज मुस्कान और करुणापूर्ण हृदय से धाम पर उपस्थित समस्त श्रद्धालु भक्त जनों को आशीर्वाद दिया। इसके उपरांत, श्री बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर और वहां की मिट्टी से प्रेम पूर्वक विदा लेकर वे अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चले।

