रायगढ़ (रोहित तिर्की)। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में मांड नदी पर स्थापित 7.5 मेगावाट जलविद्युत परियोजना के खिलाफ दायर जनहित याचिका को साक्ष्यहीन और गुण-दोष से रहित मानते हुए खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने कहा कि केवल समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरों या अपुष्ट आरोपों के आधार पर जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा जमा प्रतिभूति (जमानत) राशि भी राजसात करने का आदेश दिया।


यह फैसला WPPIL No. 33/2026 (विवेक कुमार पांडेय बनाम छत्तीसगढ़ शासन एवं अन्य) में सुनाया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि ग्राम भालूपाखना स्थित शासकीय वन भूमि पर बिना वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत आवश्यक अनुमति लिए जलविद्युत परियोजना का निर्माण किया जा रहा है। याचिका में परियोजना पर रोक, यथास्थिति बनाए रखने और स्वतंत्र जांच समिति गठित करने की मांग की गई थी।


मामले की जांच के लिए राजस्व एवं वन विभाग के अधिकारियों ने संयुक्त निरीक्षण किया। 23 मार्च और 20 जून 2026 को ग्रामीणों की मौजूदगी में पंचनामे तैयार किए गए। जांच रिपोर्ट में संबंधित भूमि पर पावर हाउस, पेनस्टॉक या स्विचयार्ड का निर्माण नहीं पाया गया और न ही अवैध वृक्ष कटाई के प्रमाण मिले। राजस्व अभिलेखों में भूमि को अधिसूचित वन भूमि नहीं बल्कि बड़े झाड़ के जंगल एवं निस्तार प्रयोजन हेतु आरक्षित राजस्व भूमि बताया गया। साथ ही कंपनी द्वारा आवश्यक एनओसी और अन्य वैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त करने की पुष्टि भी रिपोर्ट में की गई।


अपने निर्णय में उच्च न्यायालय ने कहा कि जनहित याचिका का उद्देश्य वास्तविक जनहित की रक्षा करना है, न कि बिना ठोस साक्ष्यों के विकास कार्यों में बाधा उत्पन्न करना। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के 'स्टेट ऑफ उत्तरांचल बनाम बलवंत सिंह चौफाल' फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की नीयत और प्रस्तुत तथ्यों की विश्वसनीयता से संतुष्ट हुए बिना जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ता जांच रिपोर्टों को अविश्वसनीय साबित करने में असफल रहा, इसलिए अनुच्छेद-226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।


निर्णय के बाद कंपनी प्रबंधन और प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार थे, जिनके कारण परियोजना से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ा तथा विभिन्न विभागों का समय और संसाधन जांच में व्यय हुआ। कंपनी अधिकारियों का दावा है कि पूरे प्रकरण के पीछे एक पूर्व कर्मचारी और कुछ बाहरी व्यक्तियों की कथित भूमिका रही, जिससे कंपनी को करोड़ों रुपये की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आर्थिक क्षति हुई। हालांकि कंपनी भविष्य में कोई कानूनी कार्रवाई करेगी या नहीं, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है।