भोपाल, पंकज यादव। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन अपने चुनावी प्रबंधन और चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाली कार्यशैली के लिए जानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अभी से अपनी गोटियां बिछाना शुरू कर दिया है। एक चुनाव जीतने के तुरंत बाद अगले चुनाव की तैयारी में जुटने वाली भाजपा ने मध्य प्रदेश को लेकर सत्ता और संगठन के बीच एक बेहद कड़ा और गोपनीय 'ब्लूप्रिंट' (दिशा-निर्देश) साझा किया है। सूत्रों के हवाले से सामने आई इस नई गाइडलाइन ने उन तमाम नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं, जो हाल ही में निगम, मंडल, आयोग और प्राधिकरणों के अध्यक्ष पद की मलाई पाकर फूले नहीं समा रहे थे। इस नए ब्लूप्रिंट के मुताबिक, पार्टी आलाकमान ने साफ कर दिया है कि इस बार चुनाव में किसी भी निगम-मंडल के अध्यक्ष को विधानसभा का टिकट नहीं थमाया जाएगा।
पावर शो करने वाले नेताओं के अरमानों पर फिरा पानी
पॉलिटिक्स की दुनिया में निगम-मंडल के अध्यक्ष पद का मतलब कैबिनेट या राज्य मंत्री का दर्जा, आलीशान बंगला, चमचमाती गाड़ी, नौकर-चाकर और सत्ता की पूरी ठसक माना जाता है। यही वजह थी कि पद मिलते ही कई नेताओं ने बड़ी-बड़ी गाड़ियों का लंबा काफिला निकालकर और जमकर स्वागत करवाकर अपनी राजनैतिक ताकत (पॉलिटिकल पावर) दिखाने की पूरी कोशिश की थी। हालांकि, नेताओं की यह पैंतरेबाजी और रसूख का प्रदर्शन पार्टी आलाकमान, सत्ता और संगठन को कतई रास नहीं आया है। पार्टी ने करीब 18 विभागों से जुड़े 63 निगम-मंडलों और आयोगों में की गई इन नियुक्तियों को केवल एक 'राजनैतिक पुनर्वास' माना है, जिसके जरिए नेताओं की नाराजगी दूर कर चुनावी और सामाजिक समीकरणों को साधा गया था। अब पार्टी ने दोटूक कह दिया है कि इन लाभ के पदों पर बैठे माननीयों को चुनावी मैदान से दूर रखा जाएगा।
"अपन घर भूलो और दूसरा घर संभालो", गुटबाजी पर कड़ा प्रहार
बीजेपी के इस नए ब्लूप्रिंट का सबसे कड़ा निर्देश यह है कि इन अध्यक्षों को तत्काल प्रभाव से 'अपना घर' यानी अपना वह गृह क्षेत्र भूलना होगा, जहाँ उनका भारी राजनैतिक दबदबा है। पार्टी ने तय किया है कि इन नेताओं को उनके गृह नगर या आसपास के क्षेत्रों में ज्यादा समय बिताने की अनुमति नहीं होगी। इस कड़े फैसले के पीछे मुख्य वजह यह है कि जब ये कद्दावर नेता अपने क्षेत्र से बाहर रहेंगे, तो वहां आगामी चुनाव के मूल दावेदारों या घोषित प्रत्याशियों के काम में किसी भी तरह की दखलंदाजी नहीं कर पाएंगे। इससे स्थानीय स्तर पर होने वाली गुटबाजी, खींचतान और भितरघात (अंदरूनी विरोध) जैसे आत्मघाती फैक्टर्स को पूरी तरह खत्म (जीरो) किया जा सकेगा।
कमजोर और हारी हुई सीटों पर झोंकनी होगी पूरी ताकत
अब सवाल यह उठता है कि यदि ये अध्यक्ष अपने गृह क्षेत्र में नहीं जाएंगे तो करेंगे क्या? भाजपा की गाइडलाइन में इसका भी विस्तृत खाका तैयार किया गया है। इन सभी निगम-मंडल अध्यक्षों को अपनी पूरी राजनैतिक ताकत, रसूख और रुतबा उन विधानसभा सीटों पर झोंकना होगा, जहाँ भाजपा का संगठन बेहद कमजोर है या जहाँ पिछले चुनावों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि यदि ढाई साल पहले से ही इन सीनियर और अनुभवी नेताओं की सीधी निगरानी में कमजोर बूथों और सीटों को मजबूत करने का काम शुरू कर दिया जाए, तो मुख्य चुनाव आने तक स्थिति पूरी तरह पार्टी के नियंत्रण में आ जाएगी।
नगरीय निकाय चुनाव बनेगा 'एसिड टेस्ट', पुअर परफॉर्मेंस पर छिनेगी कुर्सी!
विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव होने हैं, जिन्हें सत्ता का वास्तविक 'सेमीफाइनल' माना जाता है। ये चुनाव साफ कर देते हैं कि जमीनी स्तर पर किस राजनैतिक दल की पकड़ कितनी मजबूत है। बीजेपी इस सेमीफाइनल के नतीजों को अपनी प्रयोगशाला में कसौटी पर कसेगी। इसी चुनाव से यह तय होगा कि किस निगम-मंडल अध्यक्ष ने उसे सौंपी गई जिम्मेदारी को कितनी शिद्दत से निभाया है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर यह सुगबुगाहट बेहद तेज है कि जो भी अध्यक्ष इस जमीनी परीक्षा (टेस्ट) में फेल होगा या जिसकी रिपोर्ट 'पुअर परफॉर्मेंस' वाली आएगी, उसे अपनी अध्यक्ष पद की मलाईदार कुर्सी से भी हाथ धोना पड़ सकता है। संगठन को मजबूत करने के लिए बीजेपी की यह सख्ती कितनी कारगर होगी, इसका वास्तविक जवाब नगरीय निकाय चुनावों के परिणाम ही तय करेंगे।

