प्रशांत महासागर की सतह पर हो रहे एक प्राकृतिक बदलाव ने दुनिया भर के जलवायु वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं की धड़कनों को बढ़ा दिया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और वैश्विक मौसम एजेंसियों ने एक ऐसी गंभीर चेतावनी जारी की है, जिसने पूरी वैज्ञानिक बिरादरी की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आगामी वर्ष 2027 में दुनिया को एक बेहद 'शक्तिशाली एल नीनो' (El Niño) का सामना करना पड़ सकता है। आशंका जताई जा रही है कि यह आसन्न संकट वर्ष 1877-78 के उस ऐतिहासिक और विनाशकारी एल नीनो से भी अधिक बर्बादी ला सकता है, जिसने तब वैश्विक स्तर पर भीषण अकाल और तबाही मचाई थी।


क्रिसमस से जुड़ा है नाम: सदियों पुरानी है कहानी

'एल नीनो' मूल रूप से स्पैनिश भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है—"छोटा बच्चा" या "क्राइस्ट चाइल्ड" (ईश्वर का बच्चा)। सदियों पहले पेरू और इक्वाडोर (दक्षिण अमेरिका) के मछुआरों ने देखा कि कुछ विशेष वर्षों में दिसंबर (क्रिसमस के आस-पास) के महीने में समुद्र का सतही पानी अचानक असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इस गर्म पानी के कारण समुद्र में मछलियों की संख्या नाममात्र रह जाती थी और मछुआरों का धंधा ठप हो जाता था। चूंकि यह घटना क्रिसमस के समय दिखाई देती थी, इसलिए स्थानीय मछुआरों ने इसे 'क्राइस्ट चाइल्ड' या 'एल नीनो' नाम दे दिया।


समुद्र का विज्ञान: कैसे पैदा होता है एल नीनो?

मौसम विज्ञानियों के अनुसार, एल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में होने वाली एक चक्रवातीय और थर्मल घटना है। इसकी पूरी प्रक्रिया को दो चरणों में समझा जा सकता है:


एल नीनो और ला नीनो महासागरीय जल और हवाओं की दो विपरीत स्थितियां हैं। सामान्य स्थिति के दौरान मजबूत व्यापारिक पवनें (वायुएं) समुद्र के गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं, जिससे पूर्वी प्रशांत महासागर यानी पेरू तट के पास नीचे से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आ जाता है।


इसके विपरीत, जब एल नीनो की स्थिति बनती है, तो ये व्यापारिक पवनें कमजोर हो जाती हैं या अपनी दिशा बदलकर उल्टी बहने लगती हैं। इस वजह से समुद्र का गर्म सतही पानी वापस पूर्व यानी अमेरिका की ओर लौटने लगता है, जिससे मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 3°C से 5°C तक बढ़ जाता है। यह गर्म दौर भारतीय मानसून के लिए अत्यंत विनाशकारी और बुरा माना जाता है, जबकि ला नीनो का ठंडा दौर इसके बिल्कुल विपरीत काम करता है और भारत में मजबूत मानसून व बेहतर बारिश का कारण बनता है।


यह घटना हर 2 से 7 साल में एक बार घटित होती है और इसका प्रभाव कुछ महीनों से लेकर एक साल या उससे अधिक समय तक बना रहता है।


भारत पर सीधा प्रहार: मानसून का टूटना और तपन का रिकॉर्ड

एल नीनो का वैश्विक असर जितना व्यापक है, भारत के लिए यह उतना ही चिंताजनक है। भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर मानसून पर निर्भर है, और एल नीनो इस तंत्र को सीधे चोट पहुंचाता है:


कमजोर मानसून: जब भी प्रशांत महासागर में एल नीनो सक्रिय होता है, भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ जाता है, जिससे देश में औसत से काफी कम बारिश होती है।


रिकॉर्डतोड़ गर्मी: एल नीनो के वर्षों में भारत में चिलचिलाती और जानलेवा गर्मी पड़ती है। लू (Heat Waves) के सारे पुराने रिकॉर्ड टूट जाते हैं और तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर चला जाता है। (व्यावसायिक मोर्चे पर देखें तो इस दौरान एसी, फ्रिज और कोल्ड ड्रिंक्स की बिक्री में भारी उछाल आता है)।


खेती को भारी नुकसान: बारिश की कमी के कारण खरीफ की फसलें खेतों में ही दम तोड़ देती हैं। कृषि उत्पादन घटने से देश में खाद्यान्न संकट और अकाल जैसी परिस्थितियां निर्मित होने का खतरा बढ़ जाता है।


एल नीनो बनाम ला नीनो: क्या है अंतर?

वैज्ञानिक दृष्टि से एल नीनो और ला नीनो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो एक-दूसरे के विपरीत काम करते हैं:


एल नीनो (गर्म दौर): समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है। यह भारतीय मानसून के लिए अत्यंत विनाशकारी और बुरा माना जाता है।


ला नीनो (ठंडा दौर): इसके तहत प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। यह भारत के लिए अमृत समान है, क्योंकि इससे मानसून मजबूत होता है और देश में बंपर बारिश होती है।


जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मारक क्षमता

यूं तो एल नीनो एक पूर्णतः प्राकृतिक और आवर्ती घटना है, लेकिन वर्तमान दौर में इंसानी गतिविधियों के कारण बढ़ रहा वैश्विक तापमान (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) इस आग में घी का काम कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब एल नीनो की घटनाएं न केवल समय से पहले और बार-बार हो रही हैं, बल्कि इनकी मारक क्षमता और तीव्रता भी पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो चुकी है। यदि 2027 की चेतावनी सच साबित होती है, तो यह करोड़ों लोगों की आजीविका, वैश्विक खाद्य सुरक्षा और जल संकट के लिहाज से सदी की सबसे बड़ी मानवीय चुनौती बन सकती है।