भोपाल/खजुराहो, पंकज यादव। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) ने वर्ष 2026 के अपने राष्ट्रीय ग्राहक संतुष्टि सूचकांक की रैंकिंग जारी की है, जिसमें मध्य प्रदेश के खजुराहो हवाई अड्डे ने देश भर में पहला स्थान हासिल कर सबको चौंका दिया है। इसी सूची में राजधानी भोपाल का राजा भोज हवाई अड्डा तीसरे स्थान पर रहा है। एक शासकीय अधिकारी ने मंगलवार को यह जानकारी देते हुए इसे मध्य प्रदेश के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है।


खजुराहो हवाई अड्डे के निदेशक संतोष सिंह ने भी इस पर खुशी जताते हुए कहा कि विश्वस्तरीय सुविधाओं के दम पर मिला यह तमगा क्षेत्रीय पर्यटन को नई गति देगा। लेकिन, इस सरकारी जश्न के बीच बुंदेलखंड की जनता और पर्यटकों के बीच से एक बेहद कड़वा और तीखा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि तालियां बजाइए, माला पहनाइए, फीता काटिए और जनप्रतिनिधियों को शॉल-श्रीफल भेंट कीजिए। मगर रुकिए, यह कैसा नंबर-1 हवाई अड्डा है, जहां नियमित रूप से एक भी हवाई जहाज लैंड नहीं करता है।


सुविधाएं अच्छी...! मगर उड़ानों के नाम पर सिर्फ 'हवा'

आधिकारिक बयान के अनुसार, एएआई का यह मूल्यांकन हवाई अड्डों पर यात्रियों से मिले फीडबैक, चेक-इन प्रक्रिया, सुरक्षा जांच, टर्मिनल की स्वच्छता, कर्मचारियों के व्यवहार, प्रतीक्षा समय और खानपान जैसे कड़े मानकों के आधार पर किया गया है। खजुराहो एयरपोर्ट इन सभी मानकों में पूरी तरह अव्वल आया है। वर्तमान में यहाँ सुविधाओं का पूरा अंबार लगा हुआ है। टर्मिनल का कोना-कोना कांच की तरह चमचमा रहा है, केंद्रीयकृत एसी (एयर कंडीशनर) पूरी क्षमता से चल रहे हैं, आगंतुकों के बैठने की कुर्सियां बिल्कुल साफ हैं, रनवे भी पूरी तरह तैयार है और एयरपोर्ट के कर्मचारी भी समय पर ड्यूटी पर आ रहे हैं। यहाँ सब कुछ अपनी जगह पर मौजूद है, बस एक छोटी सी दिक्कत है कि यहाँ नियमित तौर पर उतरने वाले हवाई जहाज ही गायब हैं। जनता अब सोशल मीडिया पर तंज कस रही है कि यह कैसा सर्वश्रेष्ठ हवाई अड्डा है, जो यात्रियों के अभाव में सिर्फ 'हवा' में चल रहा है।


पहले दिल्ली-वाराणसी उतरो, फिर करो सफर

खजुराहो की विश्व प्रसिद्ध पाषाण प्रतिमाएं और पुरातात्विक मंदिर दुनिया भर से हजारों विदेशी और देशी पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। इसके साथ ही, छतरपुर जिले में स्थित सुप्रसिद्ध बागेश्वर धाम वाले बालाजी के दर्शन करने के लिए भी प्रतिदिन देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इन सभी हवाई यात्रियों को उम्मीद होती है कि वे सीधे टिकट बुक कराकर खजुराहो हवाई अड्डे पर उतरेंगे। लेकिन, धरातल पर आने के बाद उन्हें पता चलता है कि देश के इस "सर्वश्रेष्ठ" हवाई अड्डे तक पहुंचने के लिए उन्हें पहले दिल्ली, भोपाल या वाराणसी के एयरपोर्ट पर उतरना पड़ेगा और उसके बाद वहां से लगभग 8 घंटे का लंबा और थकाऊ सफर सड़क मार्ग से तय करना पड़ेगा। ऐसे में आम जनता सवाल उठा रही है कि इस कागजी नंबर-1 का फायदा किसे हुआ, एयरपोर्ट को अवार्ड का या अवार्ड को एयरपोर्ट का। बुंदेलखंड के लोगों को यह कोई नहीं समझा पा रहा है कि यह चमचमाता हुआ तमगा उनके किस व्यावहारिक काम आएगा।


फाइलों का यह महंगा म्यूजियम कब बनेगा असली हवाई अड्डा?

इस अजीबोगरीब विरोधाभास को लेकर अब क्षेत्र के राजनैतिक और प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर उंगलियां उठने लगी हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सुविधाओं के मामले में खजुराहो एयरपोर्ट निश्चित रूप से अव्वल है, लेकिन हवाई जहाजों के संचालन के मामले में यह पूरी तरह से शून्य साबित हो रहा है। आखिर यह बड़ी खामी किसकी है। उस प्रशासनिक सिस्टम की जिसने खजुराहो के लिए प्रमुख हवाई रूट ही स्वीकृत नहीं किए, या फिर क्षेत्र के उन जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की जिन्होंने संसद से लेकर विमानन मंत्रालय तक इस गंभीर मुद्दे पर कभी पुरजोर आवाज नहीं उठाई।


विश्लेषकों का भी मानना है कि ऐसे बड़े अवार्ड फाइलों में देखने में अच्छे लगते हैं, अखबारों की तस्वीरों में अच्छे लगते हैं और नेताओं के चुनावी भाषणों में भी अच्छे लगते हैं। लेकिन, धरातल पर यह अवार्ड किसी विदेशी पर्यटक के टिकट में, किसी व्यापारी के कीमती समय में और समूचे बुंदेलखंड क्षेत्र के वास्तविक विकास में अच्छे तब लगेंगे, जब इसके चमचमाते रनवे पर सचमुच के हवाई जहाज उतरना शुरू होंगे। वरना, यह देश का सर्वश्रेष्ठ हवाई अड्डा भी आने वाले समय में एक अत्यंत महंगे सरकारी म्यूजियम से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा, जहां लोग सिर्फ यह देखने आया करेंगे कि 'देखो, यह देश का वो नंबर-1 एयरपोर्ट है, जहां कभी जहाज उतरा करते थे'।