बद्रीनाथ, रोहित पाठक। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित भू-वैकुंठ यानी पवित्र बद्रीनाथ धाम अपनी अद्भुत भौगोलिक स्थिति और गहरे धार्मिक रहस्यों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। अलकनंदा नदी के पावन तट पर बसा भगवान श्रीहरि विष्णु का यह भव्य मंदिर मुख्य रूप से नर और नारायण नामक दो विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच सुशोभित है। हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन दोनों पर्वतों को महज मिट्टी और पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि साक्षात देवताओं का स्वरूप माना जाता है।
बद्रीनाथ मंदिर के ठीक सामने अलकनंदा नदी के दूसरे तट पर स्थित नर पर्वत को स्वयं भगवान नारायण के अंश यानी नर का अवतार माना गया है, जिसे हिंदू धर्म में ज्ञान, समर्पण और अखंड तपस्या का प्रतीक माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, मंदिर के ठीक पीछे मुकुट की तरह खड़ा नारायण पर्वत भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
धार्मिक दृष्टि से इस पर्वत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मान्यता है कि इसी पर्वत श्रृंखला के आंचल में महर्षि वेदव्यास ने महाभारत और वेदों की रचना की थी। आज भी इस पर्वत पर कई प्राचीन और पवित्र गुफाएं जैसे व्यास गुफा और गणेश गुफा मौजूद हैं, जो सनातन संस्कृति के स्वर्णिम इतिहास की गवाही देती हैं।
इन दोनों पर्वतों को लेकर सदियों से एक गहरी धार्मिक मान्यता चली आ रही है कि द्वापर युग में भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण नामक दो ऋषियों ने इसी पावन भूमि पर लोक कल्याण के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इन्हीं दोनों महान ऋषियों की इस कठिन साधना के कारण ही इन पहाड़ों का नाम हमेशा के लिए 'नर' और 'नारायण' पर्वत पड़ा।
शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में तपस्यारत इन्हीं ऋषियों के आशीर्वाद और अंश से महाभारत काल में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था, जिन्होंने मिलकर धर्म की स्थापना के लिए महाभारत का ऐतिहासिक युद्ध लड़ा था। यही कारण है कि बद्रीनाथ धाम पहुंचने वाले लाखों श्रद्धालु इन दोनों पर्वतों को शीश नवाकर भगवान विष्णु के नर-नारायण रूप का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।



