छतरपुर, विनोद मिश्रा। जनराय टोरिया मंदिर की संपत्ति को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मंदिर का महंत उसकी संपत्ति का प्रबंधक हो सकता है, लेकिन केवल महंत होने के आधार पर मंदिर की जमीन पर निजी मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने1998 में ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें करीब 67 एकड़ भूमि को महंत की निजी संपत्ति घोषित करने की मांग वाला दावा खारिज कर दिया गया था।
मामले में अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि मंदिर में महंत का उत्तराधिकार गुरु-शिष्य परंपरा से होता है और महंत होने के नाते उसे मंदिर तथा उसकी संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार प्राप्त है। राजस्व रिकॉर्ड में पूर्व में महंत का नाम दर्ज होने तथा विभिन्न राजस्व कार्यवाहियों में उसका उल्लेख होने को भी अपने पक्ष में आधार बनाया गया था। वहीं राज्य की ओर से कहा गया कि भूमि महंत की निजी या स्वयं अर्जित संपत्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंदिर से संबंधित संपत्ति है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रबंधन का अधिकार और स्वामित्व का अधिकार अलग-अलग हैं। कोर्ट के अनुसार अपीलकर्ता ने मंदिर का महंत होने अथवा संपत्ति के प्रबंधन के अधिकार की घोषणा नहीं मांगी, बल्कि सीधे 67 एकड़ भूमि को अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग की थी। यदि महंत मंदिर के हित में प्रशासन और संपत्ति के प्रबंधन के अधिकार की मान्यता मांगता तो स्थिति अलग हो सकती थी, लेकिन मंदिर की संपत्ति को निजी संपत्ति घोषित करना स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसी घोषणा से मंदिर की संपत्ति को निजी मानकर बेचने या हस्तांतरित करने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एम. सिद्दीक (राम जन्मभूमि मंदिर बनाम सुरेश दास) मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। मंदिर की भूमि की नीलामी के संबंध में हाईकोर्ट ने माना कि नीलामी केवल एक वर्ष के लिए खेती करने के अधिकार तक सीमित थी और इससे भूमि के स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं हुआ।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने महंत की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि महंत मंदिर की संपत्ति का प्रबंधक हो सकता है, लेकिन केवल महंत होने के आधार पर मंदिर की जमीन का निजी मालिक नहीं बन सकता।




