भोपाल/पन्ना, पंकज यादव। बुंदेलखंड की ऐतिहासिक माटी, जहाँ राजसी वैभव और अध्यात्म का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है, अपने भीतर स्थापत्य और आस्था के कई अप्रतिम अध्याय समेटे हुए है। इन्हीं सुनहरे अध्यायों में से एक है- मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में स्थित भव्य श्री जगन्नाथ मंदिर। पुरी धाम (ओडिशा) के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा श्री जगन्नाथ मंदिर होने का गौरव रखने वाला यह देवालय, मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह बुंदेला राजवंश की अद्वितीय स्थापत्य कला और अटूट भक्ति चेतना का एक जीवंत शिखर है।


पन्ना जिला पर्यटन के आधिकारिक दस्तावेजों के पन्नों को पलटें, तो इस भव्य धाम के निर्माण की कहानी सन् 1817 में ले जाती है। तत्कालीन पन्ना नरेश महाराजा किशोर सिंह जूदेव की दूरदर्शिता, अनन्य भक्ति और कला-प्रेम के परिणामस्वरूप ही इस कालजयी मंदिर की नींव रखी गई थी। मध्ययुगीन इतिहास की भव्यता और बुंदेलखंड के सांस्कृतिक गौरव को खुद में समेटे, पन्ना का यह पावन धाम आज भी हर आने वाले श्रद्धालु और इतिहास-प्रेमी को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है।


दिव्य स्वप्न और पुरी से प्रतिमाओं का आगमन

इस मंदिर की स्थापना के पीछे एक बेहद दिलचस्प लोक-परंपरा और धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, महाराजा किशोर सिंह जूदेव को स्वयं भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया था। भगवान के इसी दिव्य आदेश से प्रेरित होकर महाराजा स्वयं जगन्नाथपुरी गए और वहां से भगवान श्री जगन्नाथ, उनके भ्राता श्री बलभद्र और बहन सुभद्रा जी की अत्यंत पवित्र काष्ठ (लकड़ी) की प्रतिमाएं लेकर पन्ना आए। इन पवित्र विग्रहों को पन्ना के राज परिसर में स्थित इस नवनिर्मित मंदिर में पूरे विधि-विधान और राजसी ठाट-बाट के साथ प्रतिष्ठित करवाया गया, जो आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है।


वास्तुकला का बेमिसाल संगम और ऐतिहासिक परंपराएं

पन्ना का यह जगन्नाथ स्वामी मंदिर स्थापत्य कला और अध्यात्म का एक ऐसा अनुपम उदाहरण है जो हर बुंदेली के दिल में गर्व का भाव जगाता है। इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक मध्ययुगीन भारतीय स्थापत्य शैली में किया गया है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर बेहद कलात्मक और विशाल 'सिंह' (शेर की आकृतियां) बने हुए हैं, जो बुंदेला राजाओं के पराक्रम और राजसी वैभव को प्रदर्शित करते हैं। इसके ऊंचे और नक्काशीदार शिखर पर एक दैदीप्यमान सुनहरा कलश स्थापित है, जो दूर से ही पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। मंदिर के गर्भगृह, विशाल मंडप और प्रदक्षिणा पथ में भी पारंपरिक वास्तुकला की स्पष्ट और बारीक झलक देखने को मिलती है।


जागीरदारों के सहायक मंदिर और 200 वर्षों की रथयात्रा

यह पावन धाम सिर्फ एक अकेला देवालय नहीं है, बल्कि यह एक समृद्ध ऐतिहासिक और आध्यात्मिक परिसर है। मुख्य मंदिर प्रांगण के दोनों ओर कुल 27 छोटे-छोटे सहायक मंदिर निर्मित हैं, जिनका निर्माण पन्ना राजवंश के अलग-अलग जागीरदारों ने भिन्न-भिन्न समय पर अपनी अगाध श्रद्धा के अनुसार करवाया था। इसके अलावा, पुरी की तर्ज पर ही यहां हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को अत्यंत भव्य और विशाल रथयात्रा निकाली जाती है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, राजशाही वैभव के साथ निकलने वाली यह पवित्र रथयात्रा परंपरा पिछले लगभग 200 वर्षों से निरंतर जारी है, जो पन्ना के जनमानस की रग-रग में बसी है और यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का सबसे अहम हिस्सा बन चुकी है।