नई दिल्ली। धरती पर जिंदगी के लिए जरूरी मानी जाने वाली पर्यावरणीय सीमाओं का उल्लंघन अब चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। वैज्ञानिकों की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पृथ्वी की नौ ‘प्लैनेटरी बाउंड्री’ में से सात सुरक्षित सीमा से बाहर जा चुकी हैं और इनमें से कई में स्थिति अब तक के सबसे खराब स्तर पर पहुंच गई है।
‘प्लैनेटरी बाउंड्री’ से आशय उन प्रमुख पर्यावरणीय प्रणालियों और प्रक्रियाओं से है, जिनके भीतर रहकर पृथ्वी मानव सभ्यता के लिए अपेक्षाकृत स्थिर और सुरक्षित परिस्थितियां बनाए रख सकती है। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन, जैवमंडल की अखंडता, भूमि उपयोग, मीठे पानी में बदलाव, पोषक तत्वों के चक्र में बदलाव, नए प्रदूषकों और रासायनिक पदार्थों का फैलाव तथा समुद्री अम्लीकरण को उन क्षेत्रों में शामिल किया है, जहां खतरे की स्थिति पैदा हो चुकी है।
पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के तहत करीब 60 वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के स्वास्थ्य का यह आकलन किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में केवल दो क्षेत्रों समतापमंडलीय ओजोन परत का क्षरण और वायुमंडलीय एरोसोल में सुधार के संकेत मिले हैं। हालांकि एरोसोल यानी वायु प्रदूषण से जुड़ी समस्या दुनिया के कई हिस्सों में अभी भी गंभीर बनी हुई है।
वैज्ञानिकों के अनुसार सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन सीमाओं का पहले ही उल्लंघन हो चुका है, उन सभी पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इससे बड़े पैमाने पर लंबे समय तक बने रहने वाले और कुछ मामलों में अपरिवर्तनीय बदलाव का खतरा बढ़ रहा है।
रिपोर्ट प्रमुख लेखक बोरिस साक्सचेव्स्की ने कहा कि स्थिति का आकलन स्पष्ट है और सुरक्षित दायरे से बाहर जा चुकी हर ‘प्लैनेटरी बाउंड्री’ पर दबाव बढ़ रहा है। उनके मुताबिक इसका अर्थ है कि बड़े पैमाने पर स्थायी और संभावित रूप से अपरिवर्तनीय बदलाव का जोखिम बढ़ रहा है, जबकि इन समस्याओं से निपटने के लिए मानवता के पास उपलब्ध गुंजाइश लगातार कम हो रही है।
जलवायु वैज्ञानिक और रिपोर्ट के सह-लेखक जोहान रॉकस्ट्रॉम ने कहा कि मानवता के पास स्थिति को बदलने के लिए ज्ञान और क्षमता अभी भी मौजूद है। हालांकि इसके लिए पृथ्वी की सभी ‘प्लैनेटरी बाउंड्री’ को फिर से सुरक्षित दायरे में लाने की दिशा में तेजी से कदम उठाने की जरूरत है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक आधुनिक मानव सभ्यता पिछले करीब 10,000 वर्षों में अपेक्षाकृत स्थिर जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रही है। इसी स्थिरता ने भोजन, पानी, आश्रय और रहने योग्य वातावरण उपलब्ध कराने वाली प्राकृतिक प्रणालियों को काम करने का अवसर दिया। लेकिन जीवाश्म ईंधन जलाने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों, प्लास्टिक समेत दूसरे प्रदूषकों और प्राकृतिक आवासों के बड़े पैमाने पर विनाश ने इन प्रणालियों पर भारी दबाव डाल दिया है।
जंगलों, आर्द्रभूमियों और अन्य प्राकृतिक क्षेत्रों को कृषि तथा शहरी विस्तार के लिए लगातार बदला जा रहा है। इससे जैव विविधता को नुकसान पहुंच रहा है और उन प्राकृतिक प्रणालियों की क्षमता कमजोर हो रही है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
रिपोर्ट में विशेष रूप से जंगलों और महासागरों की भूमिका को लेकर चिंता जताई गई है। ये प्राकृतिक प्रणालियां वातावरण से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखती रही हैं, लेकिन बढ़ते तापमान और अन्य पर्यावरणीय दबावों के कारण उनकी क्षमता कमजोर पड़ने के संकेत मिल रहे हैं।
अमेजन वर्षावन को लेकर भी वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार इस विशाल कार्बन भंडार के एक ऐसे मोड़ पर पहुंचने की आशंका है, जहां इसके कुछ हिस्से वर्षावन से सवाना जैसे पारिस्थितिकी तंत्र में बदल सकते हैं। ऐसा होने पर वैश्विक जलवायु स्थिरता, खाद्य और जल सुरक्षा तथा मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।
रिपोर्ट में पहली बार समुद्री अम्लीकरण को भी उन सीमाओं में शामिल किया गया है, जिन्हें सुरक्षित दायरे से बाहर माना गया है। वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड को महासागर बड़ी मात्रा में अवशोषित करते हैं। इससे समुद्री पानी अधिक अम्लीय होता है और इसका असर उन जीवों पर पड़ता है, जो अपने खोल या कंकाल के लिए कैल्शियम कार्बोनेट पर निर्भर हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन सभी समस्याओं को अलग-अलग करके देखना भी उचित नहीं है, क्योंकि पृथ्वी की प्राकृतिक प्रणालियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। एक क्षेत्र में बदलाव दूसरे क्षेत्र की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए जलवायु परिवर्तन जैव विविधता, महासागरों, जंगलों और मीठे पानी की प्रणालियों पर एक साथ दबाव बढ़ा सकता है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब दुनिया के कई हिस्सों में चरम मौसम की घटनाओं ने जलवायु संकट की गंभीरता को रेखांकित किया है। पाकिस्तान में भीषण बाढ़, यूरोप में रिकॉर्ड गर्मी और जंगलों की आग तथा तिब्बत-नेपाल सीमा क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ जैसी घटनाओं ने पर्यावरणीय बदलावों को लेकर चिंता बढ़ाई है। महासागरों में भी रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया है।




