नई दिल्ली। देश में बढ़ते तेजाब हमलों की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए दोषियों के खिलाफ असाधारण और कठोर दंडात्मक उपायों की जरूरत पर जोर दिया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि ऐसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए कानून में संशोधन पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि तेजाब हमलों से दहेज हत्या जैसे मामलों की तरह सख्ती से निपटा जा सके।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक सजा पीड़ादायक और भय पैदा करने वाली नहीं होगी, तब तक समाज में ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तेजाब हमले जैसे मामलों में सुधारात्मक दंड की अवधारणा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
पीठ ने सवाल उठाया कि ऐसे अपराधियों की संपत्ति जब्त क्यों नहीं की जा सकती। न्यायाधीशों का मानना है कि आरोपी की संपत्ति कुर्क करने जैसे निवारक उपाय न केवल पीड़ितों को मुआवजा देने में सहायक होंगे, बल्कि भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने में भी कारगर साबित हो सकते हैं। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से कहा कि सजा को और कठोर बनाने के लिए विधायी हस्तक्षेप जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे चार सप्ताह के भीतर तेजाब हमलों से जुड़े मामलों का विस्तृत ब्योरा पेश करें। इसमें बीते वर्षों के मामलों की संख्या, अदालतों में उनकी वर्तमान स्थिति, दाखिल आरोपपत्र और उच्च न्यायालयों में लंबित अपीलों की जानकारी शामिल होगी।
अदालत ने पीड़ितों के मानवीय पक्ष को भी महत्वपूर्ण बताते हुए प्रत्येक पीड़ित की संक्षिप्त जानकारी, उनकी शैक्षणिक योग्यता, रोजगार की स्थिति, वैवाहिक स्थिति और अब तक हुए चिकित्सा खर्च का विवरण मांगा है। खासतौर पर उन मामलों की जानकारी देने को कहा गया है, जिनमें पीड़ितों को तेजाब पीने के लिए मजबूर किया गया और उनके आंतरिक अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा।
यह सुनवाई तेजाब हमले की शिकार शाहीन मलिक की याचिका पर हो रही है। मलिक ने बताया कि 26 वर्ष की उम्र में हुए हमले के बाद उन्होंने 16 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन अंत में आरोपियों को बरी कर दिया गया। कोर्ट ने उनकी पीड़ा को समझते हुए उन्हें कानूनी सहायता और बेहतर वकीलों की सुविधा देने की बात कही है।
साथ ही, अदालत ने दिव्यांग व्यक्तियों की परिभाषा के विस्तार पर भी विचार की जरूरत बताई है, ताकि आंतरिक अंगों को नुकसान झेलने वाले तेजाब पीड़ितों को भी पर्याप्त मुआवजा और सहायता मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह इस मुद्दे पर व्यापक नीतिगत बदलाव चाहती है, जिससे पीड़ितों को समय पर न्याय और समुचित पुनर्वास मिल सके।

