भोजशाला सर्वे पर महा-संग्राम: मुस्लिम पक्ष ने एएसआई की रिपोर्ट को बताया भ्रामक, हाईकोर्ट में चुनौती देने का किया ऐलान

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भोपाल। मध्यप्रदेश के धार जिले की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर चल रही कानूनी और धार्मिक रार अब एक नए मोड़ पर आ गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा हाल ही में पेश की गई रिपोर्ट, जिसमें मौजूदा कमाल मौला मस्जिद के ढांचे को एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों पर निर्मित बताया गया है, उसे मुस्लिम पक्ष ने सिरे से खारिज कर दिया है। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने इस रिपोर्ट को न केवल 'भ्रामक' करार दिया है, बल्कि इसे हाई कोर्ट में चुनौती देने का भी ऐलान किया है। मुस्लिम प्रतिनिधियों का तर्क है कि एएसआई की यह जांच तथ्यों को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करने में विफल रही है और वे 16 मार्च को अदालत के समक्ष अपनी विस्तृत आपत्तियां दर्ज कराएंगे।
मुस्लिम पक्ष का सबसे बड़ा और प्रभावी तर्क यह है कि मस्जिद के निर्माण में जिस मलबे और नक्काशीदार पत्थरों का उपयोग हुआ है, वे किसी मंदिर को तोड़कर नहीं लाए गए थे। उनके अनुसार, गुजरात के चालुक्य-सोलंकी शासकों ने धार के प्रसिद्ध राजा भोज के वैभवशाली महल को नष्ट कर दिया था। जब 1295 में निजामुद्दीन औलिया के खलीफा कमाल मौलाना धार आए, तब उस समय के कारीगरों ने पास में ही पड़े महल के मलबे और भारी पत्थरों का इस्तेमाल मस्जिद और मदरसे के निर्माण में किया। चूंकि राजा भोज एक हिंदू राजा थे, इसलिए उनके महल के अवशेषों में हिंदू वास्तुशिल्प और कलाकृतियों का होना स्वाभाविक है, लेकिन इसे मंदिर का साक्ष्य मानना तकनीकी रूप से गलत है।
सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने एएसआई की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि परिसर में खुदाई और सर्वे के दौरान कई वास्तुशिल्प तत्वों को एक विशेष 'उद्देश्य' और 'गलत इरादे' के तहत रखा गया है ताकि रिपोर्ट को एकतरफा और गुमराह करने वाला बनाया जा सके। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि उनके पास इस बात के पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि मालवा के शासक महमूद खिलजी ने सूफी संत कमाल मौलाना को यह जमीन मदरसा और मस्जिद बनाने के लिए दान में दी थी। वे इस स्थल को सदियों से एक संरक्षित मस्जिद मानते आए हैं और उनका कहना है कि यहां नमाज पढ़ना उनका अटूट अधिकार है।
अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए मुस्लिम पक्ष ने 1963 के ब्रिटिश-कालीन एएसआई सर्वे का भी हवाला दिया है। उनके अनुसार, उस समय के आधिकारिक दस्तावेजों और गजट में इस स्थान को स्पष्ट रूप से 'कमाल मौला मस्जिद' के रूप में दर्ज किया गया था और इसे एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। उनका तर्क है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों को दरकिनार कर केवल पत्थरों की नक्काशी के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना न्यायसंगत नहीं है। बहरहाल अब सबकी नजरें हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां दोनों पक्षों के ऐतिहासिक दावों और पुरातात्विक साक्ष्यों के बीच एक बड़ी कानूनी बहस होने की उम्मीद है।


