रोम। इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच चल रहे विवाद पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति के 'रवैये' को समझ नहीं पा रहे हैं।

इटली की समाचार एजेंसी एडनक्रोनोस के मुताबिक, रेडियो 24 के कार्यक्रम 'कैफे डेला डोमेनिका' में क्रोसेटो ने कहा, “अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते सरकारों या प्रधानमंत्रियों पर निर्भर नहीं करते। दोनों देशों के बीच संबंध बहुत गहरे और मजबूत हैं। मैं इन दिनों ट्रंप के रवैये को नहीं समझ पा रहा हूं, क्योंकि टीवी पर मैंने जो देखा, उससे लगा था कि इटली और अमेरिका के रिश्तों में कोई समस्या नहीं थी।”

उन्होंने कहा, “अमेरिका के साथ मेरे रिश्ते अभी भी सामान्य हैं और उनमें कोई बदलाव नहीं आया है। इटली में अमेरिकी राजदूत के साथ भी हमारे संबंध अच्छे हैं। मुझे लगता है कि वह भी इन दिनों मुश्किल स्थिति में हैं।”

क्रोसेटो ने कहा, “ट्रंप के कई फैसले उनकी अपनी सोच और विचारों पर आधारित होते हैं। हो सकता है कि कई बार उनसे सहमति न हो, लेकिन रक्षा या किसी दूसरे मामले में ऐसी कोई बात नहीं है जिसके लिए इटली को जिम्मेदार ठहराया जा सके। यूरोप के दूसरे देशों की तुलना में हमने ज्यादा योगदान दिया है, यहां तक कि सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल के मामले में भी। हमने अपने समझौतों का पूरी तरह पालन किया है, जबकि कुछ दूसरे देशों ने ऐसा नहीं किया और इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया।”

उन्होंने कहा कि यह रवैया समझना मुश्किल है और उन्हें इस बात का दुख है, क्योंकि इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मजबूत रिश्तों को नुकसान पहुंचता है।

पिछले 48 घंटों में ट्रंप ने इटली और नाटो की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यूनाइटेड स्टेट्स की ओर से होर्मुज स्‍ट्रेट से जुड़े कदमों के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं मिला है।

इस मुद्दे पर क्रोसेटो ने कहा, “दुर्भाग्य से पिछले कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं, खासकर अमेरिका और दूसरे देशों के रिश्तों में और अमेरिका-ईरान संबंधों में। यह आसान नहीं है और आगे भी आसान नहीं होगा। कुछ दिन पहले हुआ यह समझौता इस लंबे रास्ते का अंत नहीं है।”

इटली की भूमिका के बारे में उन्होंने कहा कि रक्षा और सैन्य नजरिए से देश पूरी तरह तैयार है। उन्होंने बताया कि इस तरह के हर मिशन के लिए काफी तैयारी और संगठन की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा, “जहाज पहले से ही जिबूती में मौजूद हैं। इनमें माइनहंटर जहाज शामिल हैं, जो संसद की मंजूरी और हमारी ओर से तय की गई शर्तें पूरी होने पर कार्रवाई के लिए तैयार हैं। हम युद्ध करने के लिए जहाज नहीं भेज रहे हैं, बल्कि मानवीय उद्देश्य से समुद्र में मौजूद खतरनाक बारूदी सुरंगों को हटाने के काम के लिए भेज रहे हैं। ये किसी ऐसे व्यक्ति से लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं जो हमें दुश्मन समझ सकता है या हमला कर सकता है।”

अमेरिका और ईरान के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर के बाद दोनों देश अब सीधे बातचीत कर रहे हैं, ताकि स्थायी शांति का रास्ता निकाला जा सके और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के प्रबंधन पर कोई समझौता हो सके।