नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड 107-108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय जरूर है, लेकिन इसे फिलहाल व्यापक आर्थिक संकट नहीं कहा जा सकता।बाजार विशेषज्ञों ने सोमवार को कहा कि भारत की स्थिति इस समय अपेक्षाकृत मजबूत है। देश में महंगाई नियंत्रित स्तर पर है, चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में चालू खाता घाटा (सीएडी) जीडीपी का लगभग 0.8 प्रतिशत रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स रिजर्व) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है, जो बाहरी झटकों से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं या पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन में गंभीर व्यवधान आता है, तो भारत के सामने विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाना कठिन हो सकता है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88.6 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए ऊंची कीमतों का सीधा असर आयात बिल और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
विश्लेषकों का कहना है कि आरबीआई के एक अध्ययन के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होने पर खुदरा महंगाई लगभग 49 आधार अंक तक बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क घटाती है या सब्सिडी बढ़ाती है, तो राजकोषीय घाटे पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
तेल कीमतों में वृद्धि का प्रभाव परिवहन, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों की लागत पर भी पड़ता है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी से घरेलू उपभोग प्रभावित हो सकता है और परिवारों की वास्तविक आय पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं यदि सरकार कीमतों का बोझ अपने ऊपर लेती है, तो सार्वजनिक वित्त और तेल विपणन कंपनियों की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि यदि औसत क्रूड ऑयल मूल्य 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर जीडीपी के 1.9 से 2.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जबकि पहले इसका अनुमान 0.7 से 0.8 प्रतिशत के बीच था।
ऊंचे कच्चे तेल का असर विभिन्न उद्योगों पर भी अलग-अलग होगा। एयरलाइंस, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक्स, सीमेंट, उपभोक्ता सामान और तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी तेल एवं गैस उत्पादक कंपनियों को ऊंची कीमतों से लाभ मिल सकता है। वहीं नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू गैस आधारित क्षेत्रों में निवेशकों की रुचि और बढ़ सकती है।
गौरतलब है कि सोमवार को ब्रेंट क्रूड नवंबर डिलीवरी के लिए 107.82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) भी 103 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार करता देखा गया। बाजार की नजर पश्चिम एशिया और लाल सागर के समुद्री मार्गों की स्थिति पर बनी हुई है, जहां बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।




