ताइपे। ताइवान भविष्य में चीन की किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई का मुकाबला करने के लिए बड़ी संख्या में ड्रोन और बिना चालक वाली हमलावर नौकाओं का बेड़ा तैयार कर रहा है। एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि ताइपेई यूक्रेन से सीखी गई रणनीति को तेजी से अपनाने की कोशिश कर रहा है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इन ड्रोन और बिना चालक वाली नौकाओं का उद्देश्य ताइवान की ओर बढ़ रही चीनी सेनाओं का पता लगाना और उन पर हमला करना है। इसके लिए ऐसे ताइवानी सैनिक तैयार किए जा रहे हैं जो तेजी से अपनी जगह बदल सकें और चीन के हमले से पहले कार्रवाई कर सकें।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस रणनीति को विकसित करने वाले अमेरिकी सैन्य अधिकारी इसे 'हेलस्केप' कहते हैं। इसका मकसद ड्रोन, मिसाइलों और तोपखाने की लगातार लहरों के जरिए किसी भी हमलावर सेना को इतना बड़ा जोखिम महसूस कराना है कि चीन का नेतृत्व हमला करने से पहले कई बार सोचे।
रिपोर्ट के मुताबिक, ताइवान के सामने खतरा काफी गंभीर है। चीन, जो ताइवान से लगभग 110 मील दूर है, इस स्वशासित द्वीप को अपना हिस्सा मानता है और उसके नेताओं ने कहा है कि ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के लिए बल प्रयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ताइवान यूक्रेन की 'डेविड बनाम गोलियथ' रणनीति से प्रेरणा ले रहा है, जिसमें कम लागत वाले और तेजी से काम करने वाले ड्रोन का इस्तेमाल करके कहीं बड़े और ताकतवर प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ संतुलन बनाने की कोशिश की जाती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की सेना अभी इतनी मजबूत नहीं है कि वह आसानी से ताइवान पर हमला कर सके। इसके अलावा, हाल के वर्षों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के शीर्ष नेतृत्व में हुई कार्रवाई और बदलावों ने उसकी तैयारी पर भी असर डाला है। हालांकि, ताइवान की तरह चीन भी बिना चालक वाले विमान और नौकाओं का बेड़ा बढ़ा रहा है और ड्रोन का पता लगाने तथा उन्हें निष्क्रिय करने वाली तकनीकों में भारी निवेश कर रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, ताइवान सरकार का लक्ष्य 2030 तक हर महीने 1,00,000 ड्रोन बनाना है, जिनमें से लगभग आधे निर्यात किए जाएंगे। सरकार चाहती है कि ताइवान ड्रोन उद्योग में एक बड़ी वैश्विक ताकत बने। साथ ही, ताइवानी सेना 2,10,000 हवाई और समुद्री ड्रोन हासिल करने की योजना पर भी काम कर रही है।
यूक्रेन और ताइवान की रक्षा रणनीतियों का अध्ययन कर चुके ऑस्ट्रेलिया के सेवानिवृत्त मेजर जनरल मिक रायन के अनुसार, यूक्रेन द्वारा लंबी दूरी के हमलों में मिली सफलता यह संकेत देती है कि यदि चीन समुद्री रास्ते से हमला करता है, तो ताइवान भी चीन के बंदरगाहों से निकलने वाले जहाजों को निशाना बना सकता है।
रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि ताइवान के लिए केवल ड्रोन खरीद लेना ही काफी नहीं होगा। ड्रोन युद्ध की पूरी क्षमता हासिल करने के लिए उसे अपनी सैन्य संरचना, प्रशिक्षण और युद्ध संबंधी रणनीतियों में भी बड़े बदलाव करने होंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, ताइवान को बड़ी संख्या में ड्रोन को एक साथ संचालित करना, उनसे मिलने वाली जानकारी का तेजी से विश्लेषण करना और उसे तुरंत साझा करना सीखना होगा। साथ ही, उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि दुश्मन इन ड्रोन को निष्क्रिय न कर सके। इसके लिए सैनिकों को पहले से अधिक मोबाइल और आत्मनिर्भर बनाना होगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हाल ही में ताइवान ने एक 'लिटोरल कॉम्बैट कमांड' बनाया है, जो ड्रोन, मोबाइल मिसाइल प्रणालियों और तोपखाने को एक साथ जोड़कर संभावित चीनी हमले के खिलाफ तटीय सुरक्षा कवच तैयार करेगा।




