चमोली। उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय की शांत वादियों में बसा चमोली जिला अपनी अद्वितीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। इसी जिले के मुख्यालय गोपेश्वर में स्थित 'श्री गोपीनाथ मंदिर' भगवान शिव को समर्पित एक अति प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है।गोपेश्वर के हृदयस्थल में स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि कत्यूरी राजवंश की भव्य वास्तुकला और नागर शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, 24 द्वारों वाले गर्भगृह और प्रांगण में खड़े अष्टधातु के प्राचीन त्रिशूल के लिए देश-विदेश में जाना जाता है।

शुक्रवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया के जरिए मंदिर की भव्यता का बखान किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट किया, जिसके साथ उन्होंने मंदिर की विशेषता बताते हुए लिखा, "चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित प्राचीन श्री गोपीनाथ मंदिर, भगवान शिव की अटूट भक्ति का एक बेमिसाल केंद्र है। प्रकृति की गोद में बसे इस पवित्र धाम में महादेव के दर्शन मन को असीम शांति और गहरे आध्यात्मिक अनुभव से भर देते हैं। सावन के पवित्र महीने में, चमोली पहुंचने पर, देवाधिदेव महादेव के दर्शन के लिए श्री गोपीनाथ मंदिर ज़रूर जाएं और उनका आशीर्वाद लें।"

उत्तराखंड के चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वर में स्थित प्राचीन श्री गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक धाम है। हालांकि इसका नाम 'गोपीनाथ' (जो आमतौर पर भगवान कृष्ण से जुड़ा है) है, यहां भगवान शिव की पूजा गोपी रूप में होती है और इसे चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ का शीतकालीन गद्दी स्थल भी माना जाता है। मंदिर के आंगन में अष्टधातु का एक विशाल त्रिशूल गड़ा है, जो हजारों साल पुराना बताया जाता है।

मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है, जिसमें बताया गया है कि भगवान शिव ने यहां गोपी रूप धारण किया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम गोपेश्वर और मंदिर का नाम गोपीनाथ पड़ा। दरअसल, भगवान कृष्ण जब वृंदावन में महारास रचा रहे थे और बांसुरी बजा रहे थे, तब भगवान शिव उस मोहक धुन को सुनकर वहां पहुंचे। शिवजी ने भी रास में सम्मिलित होने की इच्छा जताई, जिस पर उन्हें गोपियों का रूप धारण करना पड़ा। तभी से इस स्थान पर भगवान शिव के गोपी रूप की मान्यता जुड़ी और इसका नाम गोपीनाथ पड़ा।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव यहां तपस्या में लीन थे और कामदेव ने उनकी तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तब शिवजी ने अपना त्रिशूल उन पर फेंका था। वह त्रिशूल यहीं स्थापित हो गया।

कत्युरी राजवंश (8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच) द्वारा निर्मित यह मंदिर अपनी अनूठी शैली के लिए जाना जाता है। इसका गर्भगृह लगभग 30 वर्ग फुट का है और यहां तक पहुंचने के लिए 24 द्वार बने हुए हैं। सर्दियों के मौसम में जब रुद्रनाथ के कपाट भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाते हैं, तब भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली और प्रतीकात्मक विग्रह को इसी गोपीनाथ मंदिर में लाया जाता है, जहां जाड़े के महीने में उनकी विधिवत पूजा होती है।