नई दिल्ली। खट्टा-मीठा स्वाद और औषधीय गुणों से भरपूर करौंदा (कैरिसा कैरेंडस) भले ही एक छोटा सा जंगली फल हो, लेकिन सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। गुच्छों में लगने वाला यह फल आमतौर पर अचार, चटनी और मुरब्बे में इस्तेमाल होता है, लेकिन आयुर्वेद में इसे कई बीमारियों का प्राकृतिक इलाज माना गया है।पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने एक्स पोस्ट में कहा, "करौंदा छोटे, सुगंधित फूलों और रंग-बिरंगे फलों वाला एक उपयोगी और कम देखभाल में पनपने वाला पौधा है। इसके फलों का उपयोग अचार, जैम और जेली बनाने में किया जाता है। वहीं, यह आयरन और विटामिन-सी का भी अच्छा स्रोत माना जाता है।"

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने बताया कि करौंदे के पौधे की ऊंचाई 8-12 फीट तक होती है। पौधे पर छोटी, मोटी और विपरीत क्रम में लगी पत्तियां, तने और शाखाओं पर मजबूत कांटे, छोटे, सुगंधित सफेद फूल, फल, कच्चे हरे, पकने पर लाल से बैंगनी-काले होते हैं।

विभाग ने आगे बताया कि करौंदे ताजे फल खाने के साथ अचार, जैम और जेली में उपयोग किए जाते हैं। इसके अलावा, यह आयरन और विटामिन-सी का अच्छा स्रोत है। करौंदे के पौधे की खासियत है कि यह कम देखभाल में आसानी से पनपता है। कांटेदार होने के कारण प्राकृतिक बाड़े के लिए उपयोगी है।

इसके फल का उपयोग प्राचीन भारतीय हर्बल चिकित्सा प्रणाली, आयुर्वेद में एसिडिटी, अपच, ताजे और संक्रमित घावों, त्वचा रोगों, मूत्र संबंधी विकारों और मधुमेह के अल्सर के इलाज के लिए किया जाता है। इसके साथ ही पित्त की समस्या, पेट दर्द, कब्ज, एनीमिया, त्वचा की समस्याओं, भूख न लगने पर भी इसके फल का इस्तेमाल होता है।

करौंदे के पत्तियों का काढ़ा बुखार, दस्त और कान दर्द के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, करौंदे की जड़ें पेट की बीमारियों के लिए, खुजली के लिए कृमिनाशक दवा के रूप में और कीटनाशक के रूप में भी काम करती हैं।