नई दिल्ली। आजादी के बाद भारत में हुई तेज आर्थिक प्रगति ने 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को हासिल करने के लिए मजबूत आधार तैयार किया है। हालांकि, देश की विकास गति को बनाए रखने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में लगातार निवेश करना बेहद जरूरी होगा। यह बात इकोनॉमिक्स ऑब्जर्वेटरी की एक नई रिपोर्ट में कही गई है।इस रिपोर्ट के अनुसार, 1947 में आजादी मिलने के बाद से भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक बदलाव देखा है। कभी व्यापक गरीबी, सीमित औद्योगिक क्षमता और कमजोर बुनियादी ढांचे वाली अर्थव्यवस्था आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुकी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले लगभग 80 वर्षों में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस दौरान लोगों की औसत आयु दोगुने से अधिक हो गई है, जबकि वयस्क साक्षरता दर में लगभग छह गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने तकनीकी क्षेत्र में भी बड़ी छलांग लगाई है। कभी मिट्टी के तेल के दीयों पर निर्भर रहने वाला देश आज परमाणु कार्यक्रम जैसी उन्नत तकनीकी क्षमताएं विकसित कर चुका है।

रिपोर्ट के अनुसार, 1.4 अरब से अधिक आबादी के साथ दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनना भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पास बड़ी संख्या में युवा कार्यबल मौजूद है, जो आर्थिक विकास को नई गति दे सकता है। लेकिन इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, कौशल विकास और रोजगार सृजन में पर्याप्त निवेश करना आवश्यक होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

इसमें कहा गया है कि पिछले दो दशकों में आय स्तर में तेजी से सुधार हुआ है, लेकिन लोगों के जीवन स्तर को और बेहतर बनाने तथा मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) में सुधार के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक प्रगति जरूरी है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नीति-निर्माताओं को स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में मध्यम अवधि के निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही, राज्यों के विकास परिणामों की बेहतर निगरानी और पिछड़े क्षेत्रों को आगे बढ़ाने के लिए डेटा सिस्टम को भी मजबूत बनाया जाना चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत वैश्विक व्यापार और वित्त में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रयास कर रहा है।

इसके अनुसार, रुपए का अंतरराष्ट्रीय उपयोग बढ़ाने, निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने और अर्थव्यवस्था में विविधता लाने से भारत बाहरी आर्थिक झटकों का सामना करने में अधिक सक्षम बन सकता है।