मुंबई। भारत के ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ बढ़ते व्यापारिक संबंध वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, खेल, महत्वपूर्ण खनिजों और कृषि सहित विभिन्न क्षेत्रों में नए अवसर खोल रहे हैं। यह जानकारी तीनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने शुक्रवार को दी।मुंबई में ऑस्ट्रेलिया के काउंसल जनरल पॉल मर्फी ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापार को दोतरफा संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। दोनों अर्थव्यवस्थाएं ऐसे उत्पाद, विशेषज्ञता और क्षमताएं उपलब्ध कराती हैं, जो एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं।

मर्फी ने कहा, “हमारे लिए व्यापार दोतरफा रास्ता है। हम भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्थाओं के बीच मौजूद पूरकता को पहचानते हैं।”

उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया अपनी जरूरत की हर चीज का कुशलतापूर्वक उत्पादन नहीं कर सकता, जबकि भारत की बड़ी आबादी की विविध जरूरतें और आकांक्षाएं हैं, जिन्हें ऑस्ट्रेलियाई कंपनियां पूरा करने में मदद कर सकती हैं।

ऑस्ट्रेलियाई अधिकारी ने कहा कि दोनों देश पारंपरिक व्यापार क्षेत्रों से आगे भी सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया-भारत स्पोर्ट्स कोलैबोरेशन रोडमैप का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह साझेदारी कई क्षेत्रों को कवर करती है और अब यह व्यावहारिक सहयोग में भी बदल रही है।

ऑस्ट्रेलिया के सीएसआईआरओ के वैज्ञानिक भारतीय शोधकर्ताओं के साथ मिलकर भारत के संसाधन आधार का आकलन करने और लिथियम जैसे खनिजों के उपयोग की संभावनाएं तलाशने पर काम कर रहे हैं। मर्फी ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया दुनिया में लिथियम का सबसे बड़ा निर्यातक है और उसके पास कई अन्य महत्वपूर्ण खनिज भी हैं, जिनमें निवेश के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं।

भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीईटीए) पर बात करते हुए विदेश व्यापार के अतिरिक्त महानिदेशक आर.के. मिश्रा ने कहा कि यह भारत का अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी व्यापार समझौता है। इसमें निवेश, लोगों की आवाजाही और सेवाओं सहित कई क्षेत्र शामिल हैं।

मिश्रा ने कहा, “इस समझौते की प्रमुख विशेषता यह है कि यह भारत का सबसे महत्वाकांक्षी व्यापार समझौता है।” उन्होंने कहा कि अब ब्रिटेन में भारत के 99 प्रतिशत उत्पादों पर शून्य शुल्क लगेगा।

न्यूजीलैंड भी भारत के साथ सहयोग की काफी संभावनाएं खासकर कृषि क्षेत्र में देखता है। भारत और दक्षिण एशिया के लिए न्यूजीलैंड के ट्रेड कमिश्नर और काउंसल जनरल ग्राहम राउस ने दोनों देशों के बीच सेब की उत्पादकता में बड़े अंतर का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड में प्रति हेक्टेयर सेब की औसत उपज करीब 50,000 टन है, जबकि भारत में यह लगभग 8,000 टन प्रति हेक्टेयर है। उन्होंने यह भी बताया कि दोनों देशों के उत्पादन के मौसम एक-दूसरे के पूरक हैं।