गोंडा। हनुमानगढ़ी नमाज विवाद को लेकर दिए गए बयान पर उठे विवाद के बीच भाजपा नेता एवं पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया। उनका आशय केवल इतना था कि हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज नहीं पढ़ी गई थी, लेकिन यदि उन्होंने उसी समय यह भी जोड़ दिया होता कि परिसर या 52 बीघा क्षेत्र के भीतर घटना हुई थी, तो इतना विवाद नहीं होता।बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि मीडिया ने उनसे सवाल पूछा था कि क्या हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ी गई थी। इस पर उन्होंने तत्काल जवाब दिया, 'नहीं।' उन्होंने कहा कि मुझे अपने जवाब में यह भी स्पष्ट करना चाहिए था कि सीढ़ियों पर नहीं, बल्कि परिसर या 52 बीघा क्षेत्र के भीतर की बात कही जा रही थी। यही बात छूट जाने से पूरे मामले ने विवाद का रूप ले लिया।
उन्होंने कहा कि जब उनसे हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़े जाने का सवाल पूछा गया तो उन्हें गहरा आघात पहुंचा। मैं हनुमान जी का भक्त हूं और अयोध्या से मेरा गहरा जुड़ाव है, इसलिए इस प्रकार का प्रश्न सुनकर स्वाभाविक रूप से भावुक और आक्रोशित हो गए। उनकी मंशा किसी भी स्तर पर मुख्यमंत्री योगी के बयान का विरोध करने की नहीं थी। मुख्यमंत्री का बयान भी सही है, अयोध्या के संतों का पक्ष भी सही है और उनका बयान भी अपने संदर्भ में सही था।
उन्होंने कहा कि उनके बयान को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो वह मुख्यमंत्री की बात काट रहे हों, जबकि ऐसी कोई भावना उनके मन में नहीं थी। रामजन्मभूमि पहले से ही विभिन्न कारणों से चर्चा में रहती है और यदि हनुमानगढ़ी को लेकर भी इसी तरह के विवाद खड़े किए जाएंगे तो इससे अयोध्या की गरिमा प्रभावित होगी। अगर सरयू मैया, हनुमान जी और रामजन्मभूमि को ही चर्चा से हटा दिया जाए तो अयोध्या में बचेगा क्या?
हनुमानगढ़ी के निर्माण को लेकर मुस्लिम शासक का उल्लेख किए जाने पर भी बृजभूषण शरण सिंह ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनके बयान का केवल आधा हिस्सा सामने लाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं हनुमानगढ़ी के अस्तित्व का उल्लेख किया है, इसलिए यह कहना कि इसका निर्माण किसी व्यक्ति विशेष ने कराया, पूरी तरह सही नहीं होगा। उन्होंने दावा किया कि 18वीं शताब्दी में एक मुस्लिम शासक याचक के रूप में हनुमानगढ़ी पहुंचा था और वहां से लाभ मिलने के बाद उसने नागा साधुओं और मुस्लिम पक्ष के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान 52 बीघा भूमि का पट्टा दिया और निर्माण कार्य में सहयोग किया। बाद में इंटरनेट और गूगल पर यह जानकारी इस रूप में प्रसारित हो गई कि हनुमानगढ़ी का निर्माण शुजाउद्दौला ने कराया था, जबकि इसके पीछे का पूरा ऐतिहासिक संदर्भ अलग है।
बृजभूषण सिंह ने कहा कि इतिहास में हनुमानगढ़ी पर कई बार आक्रमण हुए, लेकिन वहां के नागा साधुओं ने हमेशा इसकी रक्षा की और किसी भी आक्रांता को सफल नहीं होने दिया। रामजन्मभूमि और हनुमानगढ़ी दोनों ही सनातन आस्था के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं और उनकी रक्षा के लिए संतों ने लंबे समय तक संघर्ष किया।
भाजपा नेता ने कहा कि यदि 17 जुलाई को दिए गए उनके वक्तव्य से किसी की धार्मिक भावना आहत हुई हो तो वह इसके लिए क्षमा मांगते हैं। उनकी मंशा किसी को ठेस पहुंचाने की नहीं थी और न ही मुख्यमंत्री या संत समाज के विचारों का विरोध करने की थी।




