नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए हाल ही में घोषित किए गए उपायों से देश में करीब 50 अरब डॉलर का निवेश आ सकता है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारत को वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में और अधिक भागीदारी मिलती है, तो विदेशी निवेश का प्रवाह इससे भी अधिक बढ़ सकता है।आईसीआईसीआई बैंक ग्लोबल मार्केट्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक द्वारा घोषित उपायों में विदेशी मुद्रा जमा को समर्थन, कुछ बाहरी उधारों के लिए रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा और विदेशी निवेशकों को अधिक पहुंच देने जैसे कदम शामिल हैं। इन उपायों से लगभग 50 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित होने की संभावना है।
बता दें कि आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखते हुए कई ऐसे कदमों की घोषणा की है, जिनका उद्देश्य विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाना, बाजार में तरलता की स्थिति बेहतर करना और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय बाजारों को समर्थन देना है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने शुक्रवार को ब्याज दरों को यथावत रखने और तटस्थ रुख बनाए रखने का फैसला किया। समिति ने इसके पीछे पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, ऊंची ऊर्जा कीमतों और वैश्विक विकास व महंगाई को लेकर बनी अनिश्चितताओं को कारण बताया।
आईसीआईसीआई बैंक ग्लोबल मार्केट्स के विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी निवेश में बढ़ोतरी से रुपए को मजबूती मिल सकती है, बैंकिंग प्रणाली पर फंडिंग का दबाव कम हो सकता है और बाजार में कुल मिलाकर तरलता की स्थिति बेहतर हो सकती है।
नीतिगत घोषणाओं में एक महत्वपूर्ण फैसला फुली एक्सेसिबल रूट (एफएआर) का विस्तार भी रहा, जिसके तहत विदेशी निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों (गवर्नमेंट सिक्योरिटीज) में निवेश की अधिक सुविधा मिलेगी।
हाल में बॉन्ड निवेश पर दिए गए कर प्रोत्साहनों के साथ मिलकर यह कदम भारत को वैश्विक ऋण बाजारों में और गहराई से जोड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत को व्यापक वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में अधिक भागीदारी मिलती है, तो इससे अतिरिक्त विदेशी निवेश भी आकर्षित हो सकता है।
इन घोषणाओं के बाद वित्तीय बाजारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई। रुपया हाल की कमजोरी से उबरता नजर आया, जबकि बॉन्ड बाजारों में विदेशी निवेशकों की बढ़ती भागीदारी की उम्मीदों के अनुरूप बदलाव देखा गया।
हालांकि विदेशी निवेश प्रवाह को लेकर उम्मीदें मजबूत हुई हैं, लेकिन विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि महंगाई अभी भी एक बड़ा जोखिम बनी हुई है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं आर्थिक परिदृश्य पर दबाव बनाए हुए हैं और आगे भी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।

